Last Updated: October 4, 2026

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हर गर्मी प्यास, हर बरसात बाढ़ — क्या यही विकास है?

July 4, 2026

हर गर्मी प्यास, हर बरसात बाढ़ — क्या यही विकास है?

Thirst every summer, flood every rainy season : भारतीय शहर आज विकास की सबसे बड़ी विडंबना का प्रतीक बन चुके हैं। वर्ष का एक हिस्सा पानी की एक-एक बूंद के लिए भटकते हुए गुजरता है, तो दूसरा उसी पानी से बचने के संघर्ष में।

सूखे से सैलाब तक : विकास मॉडल पर प्रकृति का सवाल

कुछ ही महीने पहले दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे महानगरों में सूखे नल, घटता भूजल, टैंकरों के पीछे लंबी कतारें और “वॉटर क्राइसिस” के बोर्ड दिखाई दे रहे थे। आज वही शहर मूसलाधार बारिश में डूबे हैं। सड़कें नदियों में बदल गई हैं, मेट्रो स्टेशन जलमग्न हैं, वाहन बह रहे हैं और जनजीवन ठप पड़ा है। यह केवल मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि उस विकास मॉडल की विफलता है जिसने प्रकृति के साथ चलने के बजाय उसे पराजित करने का भ्रम पाल लिया।

सूखा और बाढ़ का विरोधाभास

सबसे बड़ी चिंता यह है कि जल संकट और जलभराव अब अलग-अलग समस्याएँ नहीं, बल्कि एक ही अव्यवस्थित व्यवस्था के दो चेहरे हैं। गर्मियों में दिल्ली का भूजल खतरनाक स्तर तक गिर जाता है और लोग पानी के लिए भटकते हैं, जबकि मानसून की पहली तेज बारिश में वही इलाके घुटनों तक पानी में डूब जाते हैं। मुंबई में हर वर्ष लोकल ट्रेनें ठप पड़ती हैं और लाखों लोग प्रभावित होते हैं। तकनीकी राजधानी बेंगलुरु में सड़कें जलमग्न होने पर आईटी कंपनियों को वर्क फ्रॉम होम लागू करना पड़ता है। चेन्नई में 2015 की विनाशकारी बाढ़ की यादें आज भी भय पैदा करती हैं। शहरी विकास मंत्रालय के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में प्रमुख शहरों में जलभराव की घटनाएँ लगभग 35 प्रतिशत बढ़ी हैं। यह केवल वर्षा की तीव्रता नहीं, बल्कि हमारी योजनागत विफलता का प्रमाण है।

विकास की भारी कीमत

इस संकट की जड़ें प्रकृति में नहीं, हमारी विकास नीति में हैं। शहरों के अंधाधुंध विस्तार ने झीलों, तालाबों, वेटलैंड्स और प्राकृतिक जलमार्गों को निगल लिया। सदियों तक वर्षा जल सँभालने वाले जलाशयों की जगह मॉल, बहुमंज़िला इमारतें, कॉलोनियाँ और सड़कें खड़ी हो गईं। नतीजतन वर्षा जल के प्राकृतिक निकास मार्ग समाप्त हो गए। बादल अपना काम करते हैं, लेकिन शहर विफल हो जाते हैं। पानी के पास बहने का रास्ता नहीं बचता, इसलिए वह सड़कों, बेसमेंटों, मेट्रो स्टेशनों और रिहायशी इलाकों में भर जाता है। दिल्ली-एनसीआर का अनेक स्थानों पर 50–60 वर्ष पुराना ड्रेनेज तंत्र आज की आबादी और वर्षा का दबाव नहीं झेल पा रहा, जबकि मुंबई में समुद्र से पुनः प्राप्त भूमि पर जल निकासी और गंभीर हो गई है। प्रकृति को कुचलकर किए गए विकास की कीमत आज हर नागरिक चुका रहा है।

हर साल दोहराती तैयारी की विफलता

स्थिति इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि यह कोई अप्रत्याशित आपदा नहीं। हर वर्ष मानसून आता है, भारी बारिश होती है और जलभराव होता है, फिर भी प्रशासन की तैयारी अधूरी रहती है। नालों की सफाई अधूरी, पंपिंग स्टेशन खराब, ड्रेनेज का आधुनिकीकरण फाइलों में और जल निकासी पर निवेश नाकाफी रहता है। नतीजा, कुछ घंटों की बारिश ही शहर की रफ्तार थाम देती है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के अनुसार, शहरी बाढ़ से हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है। इसके बावजूद स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में ड्रेनेज, भूजल पुनर्भरण और वर्षा जल प्रबंधन प्राथमिकता नहीं बन पाए। योजनाएँ आधुनिक दिखती हैं, लेकिन बुनियादी ढाँचा आज भी जर्जर और उपेक्षित है।

उदासीनता की कीमत आम जनता पर भारी

प्रशासनिक उदासीनता की सबसे बड़ी कीमत आम नागरिक चुकाते हैं। कर्मचारी घंटों जाम में फँसते हैं, विद्यार्थी विद्यालय नहीं पहुँच पाते, छोटे व्यापारी कारोबार ठप होने को विवश होते हैं और कई बार गंभीर रोगी समय पर अस्पताल तक नहीं पहुँच पाते। जलभराव केवल असुविधा नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं, संक्रामक रोगों, बिजली संकट और आर्थिक ठहराव का कारण बनता है। दूसरी ओर गर्मियों में यही नागरिक टैंकरों से महँगा पानी खरीदने को मजबूर होते हैं। यानी कुछ ही महीनों में एक ही शहर पानी की कमी और पानी की अधिकता—दोनों का संकट झेलता है। इससे बड़ा विकास का विरोधाभास क्या हो सकता है?

समाधान की दिशा में कदम

स्पष्ट है कि समस्या का समाधान केवल राहत कार्यों से नहीं होगा। भारत को ऐसी समग्र जल नीति चाहिए, जो जल संरक्षण, जल निकासी और भूजल पुनर्भरण—तीनों को समान महत्व दे। हर नए निर्माण में वर्षा जल संचयन, पर्मिएबल सड़कें तथा वेटलैंड्स, झीलों और तालाबों का संरक्षण अनिवार्य हो। उपेक्षित पारंपरिक जलाशयों के पुनर्जीवन का राष्ट्रीय अभियान चलाया जाए। दिल्ली, बेंगलुरु और हैदराबाद में वेटलैंड पुनर्स्थापन के सफल मॉडल साबित कर चुके हैं कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और वैज्ञानिक योजना से जल संकट और जलभराव, दोनों पर प्रभावी नियंत्रण संभव है। अब इन्हें देश की शहरी नीति का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।

जल आधारित शहरी नियोजन

समय आ गया है कि शहरों की योजना कंक्रीट नहीं, जल के आधार पर बने। किसी भी सड़क, कॉलोनी, फ्लाईओवर, मेट्रो या आवासीय परियोजना को तभी स्वीकृति मिले, जब वह प्राकृतिक जल प्रवाह में बाधा न बने। शहरी नियोजन का हर निर्णय इस सोच पर आधारित हो कि वर्षा का पानी संकट नहीं, भविष्य की जल सुरक्षा का सबसे बड़ा स्रोत है। वर्षा जल का वैज्ञानिक संचयन, भूजल पुनर्भरण और प्राकृतिक जलमार्गों का पुनर्जीवन सुनिश्चित हो जाए, तो आज का यही पानी कल सबसे बड़ी जीवन-संपदा बन सकता है।

विकास की दिशा बदलना अब जरूरी

भारतीय शहर आज ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ विकास की दिशा बदलना अनिवार्य है। प्रकृति से संघर्ष कर कोई सभ्यता लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह सकती। जो विकास प्रकृति को मिटाता है, प्रकृति भी उसे टिकने नहीं देती। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई—हर महानगर यही चेतावनी दे रहा है कि अभी भी समय है। यदि जल-संवेदनशील शहरी नियोजन, उत्तरदायी प्रशासन और प्रभावी जल नीति को तुरंत लागू नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में शहर हर मानसून में डूबेंगे और हर गर्मी में प्यासे रहेंगे। तब इतिहास यही दर्ज करेगा कि हमने पानी को संसाधन नहीं, संकट बना दिया—और यही हमारे विकास मॉडल की सबसे बड़ी विडंबना होगी।
-प्रो. आरके जैन “अरिजीत

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