लखनऊः बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने एक बार फिर अपने समधी और पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से बाहर कर दिया है। उनके साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और बसपा कोऑर्डिनेटर रणधीर सिंह बेनीवाल को भी अनुशासनहीनता के आरोप में निष्कासित कर दिया गया है। खास बात यह है कि अशोक सिद्धार्थ की पिछले साल ही पार्टी में वापसी हुई थी, लेकिन अब मायावती ने साफ कर दिया है कि भविष्य में उन्हें किसी भी हालत में दोबारा पार्टी में शामिल नहीं किया जाएगा।
पहले जिम्मेदारियां छीनीं, फिर किया निष्कासित
मायावती ने एक दिन पहले ही अशोक सिद्धार्थ से दिल्ली, कर्नाटक, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों का प्रभार वापस ले लिया था। इसके अगले ही दिन उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक लंबा पोस्ट लिखकर उनके निष्कासन की घोषणा कर दी। इसी तरह रणधीर सिंह बेनीवाल से भी पंजाब, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की जिम्मेदारियां वापस लेकर उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया।
1. जैसाकि सर्वविदित है कि श्री अशोक सिद्धार्थ, पूर्व सांसद को महाराष्ट्र के चुनाव में खा़सकर पार्टी टिकट के बंटवारे को लेकर बी.एस.पी. महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष आदि के साथ सही से तालमेल करके नहीं चलने की वजह से अनुशासनहीनता व दिशा-निर्देश का उल्लंघन करने पर पार्टी से निष्कासित कर…
— Mayawati (@Mayawati) August 2, 2026
महाराष्ट्र चुनाव के दौरान शुरू हुआ विवाद
मायावती ने अपने पोस्ट में बताया कि अशोक सिद्धार्थ को पहले भी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान अनुशासनहीनता के कारण पार्टी से निकाला गया था। उस समय उन पर आरोप लगा था कि टिकट वितरण के मामले में उन्होंने महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष और अन्य नेताओं के साथ सही तालमेल नहीं बनाया। साथ ही उन्होंने पार्टी के दिशा-निर्देशों का पालन भी नहीं किया। बाद में उन्होंने गलती न दोहराने का भरोसा दिया, जिसके बाद उन्हें दोबारा पार्टी में शामिल कर लिया गया।
दोबारा मौका मिलने के बाद भी नहीं सुधरे
मायावती ने बताया कि पार्टी में वापसी के समय अशोक सिद्धार्थ को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वे उत्तर प्रदेश में नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों में पार्टी का संगठन मजबूत करेंगे और जनाधार बढ़ाने का काम करेंगे। इसके बाद उन्हें कर्नाटक, ओडिशा और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी गई। लेकिन मायावती के अनुसार उन्होंने इन राज्यों में भी अपनी जिम्मेदारियों का सही तरीके से निर्वहन नहीं किया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग राज्यों से लगातार अनुशासनहीनता और पार्टी के निर्देशों का पालन नहीं करने की शिकायतें मिलती रहीं। कई बार चेतावनी देने के बावजूद उनके व्यवहार में कोई सुधार नहीं आया।
यूपी लौटने की खबरों को बताया साजिश
मायावती ने अपने पोस्ट में कहा कि अशोक सिद्धार्थ के उत्तर प्रदेश में फिर से सक्रिय होने की खबरें जानबूझकर फैलाई जा रही थीं। उनके मुताबिक इसका उद्देश्य पार्टी के भीतर भ्रम पैदा करना और आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों को प्रभावित करना था। इसी वजह से पार्टी और बहुजन आंदोलन के हित को देखते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से बसपा से निष्कासित कर दिया गया।
साफ शब्दों में कहा- अब वापसी नहीं होगी
मायावती ने स्पष्ट किया कि इस बार अशोक सिद्धार्थ को हमेशा के लिए पार्टी से बाहर किया गया है। उन्होंने कहा कि भविष्य में उन्हें किसी भी परिस्थिति में दोबारा बसपा में शामिल नहीं किया जाएगा।
रणधीर सिंह बेनीवाल भी पार्टी से बाहर
अशोक सिद्धार्थ के अलावा बसपा ने सहारनपुर निवासी रणधीर सिंह बेनीवाल पर भी कार्रवाई की है। मायावती ने उन पर भी अनुशासनहीनता का आरोप लगाते हुए तत्काल प्रभाव से पार्टी से निष्कासित कर दिया। बेनीवाल के पास पंजाब, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों की संगठनात्मक जिम्मेदारी थी।
रामजी गौतम को मिली नई जिम्मेदारी
राष्ट्रीय स्तर पर किए गए संगठनात्मक फेरबदल के तहत राज्यसभा सांसद रामजी गौतम को अन्य राज्यों के साथ-साथ पंजाब का भी प्रभारी बनाया गया है। मायावती ने कहा कि वे आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव और उसके बाद होने वाले लोकसभा चुनाव तक इस जिम्मेदारी का निर्वहन करेंगे।
यूपी के नेताओं को नहीं मिलेगा यूपी का प्रभार
मायावती ने अपने संदेश में एक बार फिर पार्टी की पुरानी नीति दोहराई। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के रहने वाले बसपा पदाधिकारियों को राज्य के भीतर संगठन की जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूपी के नेता हमेशा दूसरे राज्यों में संगठन मजबूत करने का काम करेंगे, जबकि उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दूसरे राज्यों के नेताओं को सौंपी जाएगी।
पार्टी अनुशासन पर दिया जोर
मायावती ने कहा कि बसपा में अनुशासन सर्वोपरि है। जो भी नेता पार्टी के नियमों और दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करेगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि पार्टी और बहुजन आंदोलन के हित में संगठनात्मक अनुशासन बनाए रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
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