वाराणसी: उत्तर प्रदेश के वाराणसी में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के सर सुंदरलाल चिकित्सालय के कार्डियोथोरेसिक एवं वैस्कुलर सर्जरी (सीटीवीएस) विभाग में डॉ. अरविंद पांडेय के नेतृत्व में मिनिमली इनवेसिव कोरोनरी आर्टरी बाईपास सर्जरी (एमआईसीएस-सीएबीजी) की शुरुआत की गई है। इसे सामान्य बोलचाल में ‘की-होल हृदय सर्जरी’ भी कहा जाता है। चिकित्सालय तथा पूर्वांचल में पहली बार विभाग की टीम ने इस विधि से कोरोनरी आर्टरी बाईपास सर्जरी सफलतापूर्वक की।
वाराणसी निवासी 52 वर्षीय मरीज के हृदय की धमनियों में गंभीर एवं कैल्सीफाइड रुकावट थी, जिसके कारण उन्हें बार-बार सीने में दर्द तथा हृदयाघात की समस्या हो रही थी। आवश्यक जांच के बाद उन्हें एमआईसीएस-सीएबीजी सर्जरी की सलाह दी गई।
सामान्य कोरोनरी आर्टरी बाईपास सर्जरी में छाती की मध्य अस्थि (स्टर्नम) को काटकर शल्यक्रिया की जाती है, जबकि मिनिमली इनवेसिव विधि में बड़े चीरे के बजाय छोटे चीरे के माध्यम से सर्जरी की जाती है। मरीज की बाईं ओर पसलियों के बीच लगभग आठ सेंटीमीटर का चीरा लगाकर बाईपास सर्जरी सफलतापूर्वक संपन्न की गई। शल्यक्रिया के बाद मरीज की रिकवरी संतोषजनक रही और पांचवें दिन उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। तीन-चार फॉलोअप के बाद मरीज सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
विभाग में बाईपास सर्जरी, वाल्व प्रत्यारोपण, जन्मजात हृदय रोगों तथा महाधमनी एवं रक्त वाहिकाओं की सर्जरी नियमित रूप से की जाती है। एमआईसीएस विधि से वाल्व और जन्मजात हृदय रोगों की शल्यक्रियाएं भी की जा रही हैं। इस विधि में चीरा छोटा होने से दर्द और घाव अपेक्षाकृत कम होता है तथा मरीज को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ मिलता है।
शल्यक्रिया में सीटीवीएस टीम के डॉ. नरेंद्र नाथ दास एवं डॉ. किनीशों, एनेस्थीसियोलॉजी टीम के डॉ. संजीव, डॉ. सोनल एवं डॉ. सोरिंग सहित परफ्यूजनिस्ट, नर्सिंग अधिकारियों और तकनीकी सहायकों ने सहयोग किया। विभागाध्यक्ष प्रो. सिद्धार्थ लखोटिया और एनेस्थीसियोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. ए. पी. सिंह के मार्गदर्शन में सर्जरी संपन्न हुई। संस्थान प्रमुख प्रो. एस. एन. शंखवार एवं चिकित्सा अधीक्षक प्रो. पुनीत का सहयोग भी उल्लेखनीय रहा।

