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हिंदुत्व जीवनशैली है, आस्था साबित करने के लिए मंदिर जाना अनिवार्य नहीं : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदुत्व जीवनशैली है और किसी हिंदू को हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या कोई अनुष्ठान करना अनिवार्य नहीं है, यहां तक कि घर के अंदर दीपक जलाना भी आस्था साबित करने के लिए पर्याप्त है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल के सबरिमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और दाऊदी बोहरा समुदाय सहित कई धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की।

15वें दिन सुनवाई शुरू होने पर हस्तक्षेपकर्त्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए अधिवक्ता डॉ. जी मोहन गोपाल ने कहा कि धार्मिक समुदायों के भीतर से सामाजिक न्याय की मांग उठ रही है। उन्होंने कहा, हिंदू धर्म को एक धार्मिक श्रेणी के रूप में परिभाषित किया गया था। उसके बाद 1966 में यह माना गया कि हिंदू वह है जो धर्म और दर्शन के सभी मामलों में वेदों को सर्वोच्च मानता है। उन्होंने मुझसे कभी नहीं पूछा। हममें से किसी ने भी ऐसा कभी नहीं कहा। उन्होंने कहा, मेरा वेदों के प्रति अत्यंत आदरभाव है।

लेकिन क्या यह सच है कि आज हिंदू कहलाने वाला प्रत्येक व्यक्ति आध्यात्मिक और दार्शनिक मामलों में वेदों को सर्वोच्च मानता है?
उनकी दलील का जवाब देते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, इसीलिए हिंदुत्व को जीवनशैली कहा जाता है। हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या कोई अनुष्ठान करना अनिवार्य नहीं है।

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