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सतलुज में जल स्तर सामान्य, फिर भी डरे गांव वासी, देश का आखिरी गांव कालूवाला तीन साल पहले बाढ़ से हुआ था तबाह

Sutlej : मानसून और बरसात के मौसम ने एक बार फिर से भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे उन सभी गांवों के हजारों किसान और गांव में रह रहे लोग एक बार फिर से डरे और सहमे नजर आ रहे हैं, क्योंकि बीते 3 साल पहले सतलुज में आई भयानक बाढ़ ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया था। इतना ही नहीं बाढ़ के पानी ने किसानों की हजारों एकड़ खेती वाली जमीन को बंजर बना दिया और खेत हजारों लाखों टन रेत से ढके गए थे। इसके अलावा सैंकड़ों एकड़ जमीन दरिया में समा गई थी। अभी गांव वालों के पुराने जख्म भरे नही थे कि अब उन्हे फिर से बाढ़ आने का खतरा सताने लगा है क्योंकि बाढ़ के समय लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था जिसकी भरपाई अभी तक भी शायद नही हो पाई।

बदलते मौसम और बरसात को देखकर सहमे हुए गांव वासी
सालों बीत जाने के बाद भी दरिया किनारे बसे गांव वाले बदलते मौसम और बरसात को देखकर सहमे हुए है की कहीं पहले की तरह ही पीछे से पानी ना छोड़ दिया जाए और यदि ऐसा हुआ तो उन्हें पहले की तरह से घर से निकलने और अपना सामान बचाने का बी मौका नही मिलेगा। घर कई कई दिनों तक सतलुज दरिया के गहरे पानी में डूबे रहे और हालात ये बने गए कि घरों के लैंटर और दीवारे गिर गई।

क्या कहना है जल स्त्रोत विभाग के सुपरिटैंडैंट इंजीनियर का : जल स्त्रोत विभाग के सुपरिटैंडैंट इंजीनियर संदीप गोयल का कहना है कि अभी बाढ़ का खतरा नहीं है और दरिया का जल स्तर भी अभी तक सामान्य ही है। उन्होंने यह भी बताया कि अभी तक हरिके हैडवर्क का डाउन स्ट्रीम चल रहा जोकि इस समय 2036 है। पानी को ईस्टर्न कनाल ओर बीकानेर कनाल में छोड़ा जा रहा है। इसके अलावा हुसैनीवाला का डाउन स्ट्रीम जीरो बताया गया है। और कहाकि अभी तक फ्लड वाटर कोई नहीं आया है और हालात सामान्य चल रहे है। किसी को भी घबराना नहीं चाहिए।

देश का आखिरी गांव कालूवाला हुआ था तबाह
हुसैनीवाला भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे सतलुज दरिया के उस पार बसे देश के आखिरी गांव कालूवाला को तीन साल पहले आई बाढ़ ने पूरी तरह से तबाह कर दिया था क्योंकि दरिया पार बसे इस गांव के करीब आधे से कहीं अधिक घर कई दिनों तक पानी में डूबे रहे या फिर पानी से जमीन पर गिर गए। गांव में भरे बाढ़ के पानी के कारण धस गए। इसके अलावा पूरे गांव में किसानों के घरों के अंदर और खेतों में छह से साथ फुट तक रेत ही रेत भर गई थी जिस कारण गांव में रहने वालों को खेती से हाथ धोना पड़ा और घर भी बर्बाद हो गए। बसे बड़ा डर तो ये है की वर्ष 1988 की तरह कहीं रात को बाढ़ आ गई तो उन्हे गांव से निकलने का अवसर भी प्राप्त नही होगा।

बाढ़ पीड़ितों के मसीहा बने थे पूर्व संसदीय सचिव सुखपाल नन्नू
वहीं बाढ़ के समय बाढ़ पीड़ितों के लिए उस समय पंजाब के पूर्व संसदीय सचिव सुखपाल सिंह नन्नू मसीहा बनकर मैदान में उतरे थे। नन्नू ने जहां पीड़ित परिवारों के लिए खाने कपड़े, राशन, पीने के लिए स्व्चछ पेय जल पर 25 लाख रुपये से भी अधिक खर्च किए थे। इसके अलावा सुखपाल सिंह नन्नू ने उन सभी पीड़िंतो के लिए जिनके घर पानी में बह गए या फिर टूट गए थे उनके रहने के लिए अपने ग्रह निवास ममदोट हाऊस के दरवाजे खोल दिए थे जहां दर्जनों परिवार रहते भी रहे जो दरिया का पानी उतरने के बाद वापिस गांव चले गए थे।

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