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50 सालों से बूंद-बूंद पानी इकट्ठा कर रहे इस गांव के लोग, इसी कारण नहीं हो रहा युवाओं का विवाह

Water Problem in Village : जल के बिना जीवन की कल्पना करना कठिन है, लेकिन कल्पना कीजिए कि यदि हर दिन पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष से शुरू हो तो जीवन कैसा होगा? मध्य प्रदेश के कटनी जिले का एक गांव आज भी इस दर्द को जी रहा है। चट्टानों से टपकने वाली हर बूँद, हर साँस की एक कीमत चुकानी पड़ती है। यहां के लोग पीढ़ियों से खाई में उतर कर , मौत से लड़ते हुए पानी भरते आ रहे हैं और हालात इतने खराब हैं कि लोग यहां अपनी बेटियों की शादी करने से भी कतराते हैं।

50 साल से स्थिति जस की तस-
कटनी जिले से महज 65 किलोमीटर दूर बहोरीबंद विकासखंड के रीठी जनपद में स्थित खुसरा गांव है, जहां पानी की तलाश में सदियों से जीवन ठहर गया है। गांव के बीच में एक खाई है, जहां चट्टानों से टपकती बूंदें एकत्र करके ग्रामीण अपनी प्यास बुझाते हैं। हर सुबह गांव की महिलाएं और बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर उस खतरनाक खाई में उतर जाते हैं। सिर पर भारी बर्तन, पैरों में कांटे और आंखों में बस एक उम्मीद– पानी की कुछ बूंदें। वृद्धा कहती हैं कि जब मैं पचास साल पहले शादी करके इस गांव में आई थी, तब भी हालात ऐसे ही थे और आज भी कुछ नहीं बदला है। बच्चे बड़े हो गए हैं, लेकिन पानी की समस्या जस की तस बनी हुई है।

पानी नहीं तो विवाह नहीं-
यह जल त्रासदी अब खुसरा गांव की पहचान बन गई है। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि बचपन से ही उन्होंने अपने प्रियजनों को गड्ढे से पानी निकालते देखा है। पानी की तलाश में युवाओं के सपने मर गए हैं। कई युवा लोग अभी भी अविवाहित हैं, क्योंकि कोई भी पिता अपनी बेटी को ऐसे गांव में नहीं देना चाहता जहां पानी नहीं है।

चुनावों के समय सिर्फ वादे-
बुजुर्ग ग्रामीण गणेश सिंह ने कहा, ‘चुनाव के समय नेता आते हैं, वादे करते हैं, लेकिन कोई काम नहीं करता। पानी के बिना कुछ भी नहीं होता, न खेती, न ही शादी। लड़की के परिवार का कहना है कि अगर पानी नहीं मिलेगा तो वे बेटी को नहीं देंगे। गर्मियों में स्थिति और भी बदतर हो जाती है। पानी की तलाश में ग्रामीणों को जंगल से होकर गुजरना पड़ता है, जहां बाघ और तेंदुए जैसे जंगली जानवर भी पानी पीने आते हैं। कभी-कभी महिलाएं जानवरों को देखकर पहाड़ पर चढ़कर अपनी जान बचा लेती हैं और फिर वही संघर्ष शुरू हो जाता है।

पानी के प्रयास में पढ़ाई छूटी-
गांव की एक छोटी बच्ची आरती कहती है, ‘मैं सुबह चार बजे से पानी भरने के लिए लाइन में खड़ी हूं, अब मेरी बारी है। मैं दस साल से पानी भर रही हूं, लेकिन कुछ भी नहीं बदला है। इस वजह से पढ़ाई भी छूट गई।’ एक अन्य बुजुर्ग ग्रामीण का कहना है कि यहां पानी की कमी है। वहां खेती नहीं हो सकती, बच्चे स्कूल नहीं जा सकते। हम किसी तरह जीवित रहते हैं। हम एक या दो घंटे लाइन में खड़े रहते हैं, तब हमें पानी मिलता है।

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