नेशनल डेस्क: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर किसी मामले में यह पक्का साबित नहीं हुआ है कि जब्त किया गया मांस गोमांस है, तो उस आधार पर वाहन को जब्त करना गलत और मनमाना है।
यह मामला उत्तर प्रदेश के बागपत जिले का है। 18 अक्टूबर 2024 को पुलिस ने एक वाहन को इस शक में पकड़ लिया था कि उसमें प्रतिबंधित मांस ले जाया जा रहा है। बाद में 16 जून 2025 को जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) ने उस वाहन को जब्त करने का आदेश दे दिया। वाहन मालिक मोहम्मद चांद ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनके वकील ने कोर्ट को बताया कि पशु चिकित्सक की रिपोर्ट में यह साफ नहीं कहा गया था कि मांस गोमांस ही है, बल्कि उसे सिर्फ “संदिग्ध” बताया गया था।
कोर्ट ने इस पर कहा कि उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई करने के लिए अधिकृत लैब (प्रयोगशाला) की पक्की रिपोर्ट जरूरी होती है। जब तक वैज्ञानिक जांच से यह साबित न हो जाए कि मांस गोमांस है, तब तक किसी भी वाहन को जब्त नहीं किया जा सकता। चूंकि इस मामले में ऐसी कोई ठोस लैब रिपोर्ट नहीं थी, इसलिए कोर्ट ने वाहन जब्त करने की पूरी प्रक्रिया को अवैध करार दिया और डीएम व मंडलायुक्त के आदेश रद्द कर दिए।
कोर्ट ने यह भी माना कि यह वाहन याचिकाकर्ता की आजीविका का मुख्य साधन था और करीब 18 महीने तक वाहन बंद रहने से उसे आर्थिक नुकसान हुआ। इसलिए कोर्ट ने यूपी सरकार को आदेश दिया कि वह 7 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता को 2 लाख रुपये मुआवजा दे। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार चाहे तो यह राशि उन अधिकारियों से वसूल सकती है, जो इस मामले में जिम्मेदार हैं।
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