नई दिल्ली: केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के पत्र का जवाब देते हुए कहा है कि सरकार ने परिसीमन के प्रस्तावों पर चर्चा करने और आम सहमति बनाने के लिए विपक्ष से कई बार संपर्क किया है। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि बार-बार अनुरोध करने के बावजूद पार्टी की ओर से बातचीत के लिए तारीख नहीं दी गई।
दरअसल, मल्लिकार्जुन खड़गे ने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चौथा पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को अंतिम रूप देने और संसद में पेश करने से पहले सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाने की मांग की थी। खड़गे का कहना था कि इतने बड़े संवैधानिक बदलाव पर सभी दलों के बीच चर्चा और सहमति जरूरी है।
रिजिजू ने बताया, कब-कब किया कांग्रेस से संपर्क
खड़गे को लिखे अपने जवाब में किरेन रिजिजू ने कहा कि उन्होंने 16 मार्च, 26 मार्च और 12 अप्रैल 2026 को पत्र लिखकर कांग्रेस से सहयोग मांगा था। उन्होंने यह भी बताया कि इस मुद्दे पर खड़गे से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की गई थी। इसके अलावा, संसद के मॉनसून सत्र के दौरान लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से भी मुलाकात की गई थी।
रिजिजू के मुताबिक, कांग्रेस से बातचीत के लिए कई बार अनुरोध किया गया, लेकिन बैठक की तारीख तय नहीं हो सकी। इसके बाद सरकार ने दूसरे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से चर्चा की। उन्होंने बताया कि परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों पर विचार-विमर्श के लिए डीएमके, समाजवादी पार्टी, वाईएसआरसीपी, एनसीपी, शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और बीजू जनता दल के प्रतिनिधियों से बातचीत की गई। रिजिजू ने कहा कि अब विपक्षी दलों को रचनात्मक सहयोग देना चाहिए, ताकि प्रस्तावित कानून पर सहमति बनाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सके।
संसद के सत्र को लेकर खड़गे के सवाल पर क्या बोले रिजिजू?
खड़गे ने अपने पत्र में यह भी सवाल उठाया था कि 13 अगस्त को मॉनसून सत्र के बाद सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने के 64 दिन बाद भी संसद को औपचारिक रूप से स्थगित क्यों नहीं किया गया। इस पर रिजिजू ने कहा कि संविधान में ऐसा कोई निश्चित समय तय नहीं किया गया है, जिसके भीतर अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए गए सदन को औपचारिक रूप से स्थगित करना जरूरी हो। उन्होंने कहा कि केवल इतने दिनों तक औपचारिक स्थगन नहीं होने को संवैधानिक या प्रक्रियागत अनियमितता नहीं माना जा सकता।
अपने पत्र में उन्होंने पुराने उदाहरण भी दिए। रिजिजू के अनुसार, अतीत में संसद के सत्रों के बीच लंबे अंतराल रहे हैं। उन्होंने 1987 में 76 दिन, 1989 में 54 दिन, 2006 में 49 दिन और 2013 में 49 दिन तक सदन की कार्यवाही से जुड़े उदाहरणों का उल्लेख किया। उन्होंने 1963 में 41 दिनों का उदाहरण भी दिया।
उन्होंने 2008 का उदाहरण देते हुए कहा कि विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के लिए लोकसभा 21 और 22 जुलाई को बैठी थी। इसके बाद सदन की बैठक 17 अक्टूबर को फिर शुरू हुई और 24 अक्टूबर को स्थगित कर दी गई, ताकि 10 दिसंबर को दोबारा बैठक हो सके। रिजिजू ने कहा कि सरकार संसदीय लोकतंत्र और सार्थक बातचीत के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने उम्मीद जताई कि कांग्रेस भी रचनात्मक भूमिका निभाएगी और महत्वपूर्ण विधायी प्रस्तावों पर चर्चा में सहयोग करेगी।
क्या है परिसीमन का मुद्दा?
परिसीमन का मतलब चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं और उनके प्रतिनिधित्व का पुनर्निर्धारण करना है। इसके जरिए लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों के बंटवारे में बदलाव किया जा सकता है। प्रस्तावित परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद हैं। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का कहना है कि नए जनगणना आंकड़ों के आधार पर परिसीमन करना और लोकसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना जरूरी है। प्रस्ताव में लोकसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने का उद्देश्य भी बताया गया है।
वहीं, कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक की मांग है कि मौजूदा 543 सदस्यीय लोकसभा में ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाए। विपक्ष महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने का विरोध कर रहा है। खड़गे ने अपने पत्र में चेतावनी दी थी कि सभी दलों की सहमति के बिना बड़े संवैधानिक बदलाव आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा। ऐसे में परिसीमन और महिला आरक्षण को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच चर्चा आने वाले समय में अहम बनी रह सकती है।

