
सहारनपुर: समाजवादी पार्टी की कैराना से लोकसभा सांसद इकरा हसन ने सहारनपुर के जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय परिसर में स्थित मस्जिद को गिराए जाने की कार्रवाई की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार के फैसले ही अंतिम माने जाएंगे और लोगों को न्याय के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया जाएगा, तो अदालतों की जरूरत ही क्या रह जाएगी।
मस्जिद गिराए जाने के बाद प्रतिक्रिया देते हुए इकरा हसन ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने कार्रवाई का विरोध करने वाले लोगों को हाई कोर्ट जाने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया। उन्होंने दावा किया कि कई प्रमुख लोगों को कार्रवाई से पहले ही नजरबंद कर दिया गया था। हसन ने कहा कि निचली अदालत के आदेश के बाद मस्जिद को सील कर दिया गया था और आसपास बैरिकेडिंग कर दी गई थी। उनके अनुसार, मस्जिद समिति और स्थानीय लोग प्रशासन से कुछ समय मांग रहे थे ताकि वे हाई कोर्ट में आदेश को चुनौती दे सकें, लेकिन उन्हें यह मौका नहीं मिला।
इकरा हसन ने ‘त्वरित न्याय’ की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी भी कार्रवाई में कानून और न्यायिक प्रक्रिया का पालन जरूरी है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार अपनी मर्जी से फैसले लागू करती रहेगी, तो देश में कानून-व्यवस्था और न्याय व्यवस्था का क्या मतलब रह जाएगा।
उन्होंने कहा, “अगर सभी फैसले सिर्फ सरकार की मर्जी से होने हैं, तो अदालतों में ताला भी लगाया जा सकता है।” सपा सांसद ने आरोप लगाया कि मस्जिद गिराने की कार्रवाई लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि वह इस मामले को अदालत में चुनौती देंगी और इसे कानूनी लड़ाई के जरिए आगे ले जाया जाएगा।
इकरा हसन ने आरोप लगाया कि मस्जिद गिराने की कार्रवाई राजनीति से प्रेरित है और इसका उद्देश्य एक विशेष समुदाय को नुकसान पहुंचाना है। उन्होंने सरकार पर धार्मिक मुद्दों का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए करने का आरोप लगाया। हसन ने यह भी दावा किया कि मस्जिद का निर्माण 1947 से पहले हुआ था।
उन्होंने पूजा स्थल अधिनियम और वक्फ से जुड़े कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में इन पहलुओं पर भी विचार किया जाना चाहिए। हालांकि, प्रशासन का कहना है कि मस्जिद का निर्माण सरकारी जमीन पर अवैध तरीके से किया गया था।
मस्जिद विध्वंस की कार्रवाई 4 सितंबर को जिला न्यायाधीश की अदालत द्वारा मस्जिद समिति की अपील खारिज किए जाने के बाद हुई। अदालत ने सिटी मजिस्ट्रेट के पहले के आदेश को बरकरार रखा। सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने 17 जुलाई को सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण और जमीन के दुरुपयोग के मामले में मस्जिद की संरचना को हटाने का आदेश दिया था।
इसके साथ करीब 6.41 करोड़ रुपये का मुआवजा भी लगाया गया था। सहारनपुर के डीआईजी अभिषेक सिंह के मुताबिक, सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने पाया था कि मस्जिद का निर्माण सरकारी जमीन पर अवैध तरीके से किया गया था। इस आदेश के खिलाफ दायर अपील को बाद में जिला अदालत ने खारिज कर दिया।
मस्जिद गिराए जाने के बाद किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से बचने के लिए सहारनपुर में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है। संवेदनशील इलाकों और हॉटस्पॉट पर अतिरिक्त पीएसी और आरएएफ जवानों की तैनाती की गई है। पुलिस सोशल मीडिया पर भी नजर रख रही है, ताकि अफवाहों और भड़काऊ सामग्री के प्रसार को रोका जा सके।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी मस्जिद गिराए जाने की आलोचना की है। उन्होंने दावा किया कि यह मस्जिद 1911 से पहले से मौजूद थी। मसूद ने आरोप लगाया कि कार्रवाई में वक्फ बोर्ड को पक्षकार नहीं बनाया गया। उन्होंने कहा कि मामले को कानूनी माध्यम से चुनौती दी जाएगी।
वहीं, इकरा हसन ने सरकार को धार्मिक मुद्दों को चुनावी राजनीति का हिस्सा बनाने के खिलाफ चेतावनी दी और कहा कि केवल धार्मिक मुद्दों के सहारे राजनीतिक जीत हासिल नहीं की जा सकती। अगर आप चाहें तो मैं इसे वेब पोर्टल के लिए 5 आकर्षक हिंदी हेडलाइन और 3 English tags के साथ भी तैयार कर सकता हूं।
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