नई दिल्ली: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शनिवार को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह बागी सांसदों के महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी दे दी। इस फैसले के बाद लोकसभा में शिंदे गुट की ताकत बढ़ गई है, जबकि उद्धव ठाकरे की पार्टी के सांसदों की संख्या घट गई है।
लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी के बाद शिंदे गुट की शिवसेना के सांसदों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है। वहीं, शिवसेना (UBT) के पास अब केवल 3 सांसद ही रह गए हैं। इसे उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
लोकसभा अध्यक्ष ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अलग हुए 20 सांसदों के लिए सदन में अलग बैठने की व्यवस्था को भी मंजूरी दे दी है। इन सांसदों ने हाल ही में क्षेत्रीय पार्टी नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का ऐलान किया था। हालांकि, इन सांसदों के NCPI में औपचारिक विलय को अभी लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी नहीं मिली है। फिलहाल उन्हें केवल अलग समूह के रूप में बैठने की अनुमति दी गई है।
पिछले महीने TMC सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 20 सांसदों ने पार्टी छोड़कर NCPI में शामिल होने का फैसला किया था। वहीं, शिवसेना (UBT) में भी टूट देखने को मिली और छह सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए
रिपोर्ट के अनुसार, इस समय 540 सदस्यों वाली लोकसभा में स्पीकर सहित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पास 298 सांसदों का समर्थन है। सदन की तीन सीटें फिलहाल खाली हैं। अगर भविष्य में लोकसभा अध्यक्ष TMC के बागी सांसदों के NCPI में विलय को भी मंजूरी दे देते हैं और वे NDA का समर्थन करते हैं, तो गठबंधन की संख्या बढ़कर 318 तक पहुंच सकती है। हालांकि, यह स्थिति भविष्य के राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगी।
इन राजनीतिक बदलावों के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि केंद्र सरकार ‘संविधान (131वां संशोधन) विधेयक’ को दोबारा लोकसभा में पेश कर सकती है। इस प्रस्तावित विधेयक में लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 850 तक बढ़ाने और ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ के तहत विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का प्रावधान बताया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार राज्यों की सीटों में समान रूप से लगभग 50 प्रतिशत बढ़ोतरी का भरोसा दिलाने की कोशिश कर रही है, ताकि इस प्रस्ताव को लेकर राज्यों की चिंताओं को दूर किया जा सके। गौरतलब है कि यह विधेयक पहले भी सदन में पेश किया गया था, लेकिन आवश्यक समर्थन नहीं मिलने के कारण पारित नहीं हो सका था। अब बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच इसके दोबारा लाए जाने की संभावना जताई जा रही है।
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