नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी नाबालिग लड़की के पायजामे का नाड़ा खींचना और उसके स्तन छूना स्पष्ट रूप से दुष्कर्म की कोशिश (Attempt to Rape) माना जाएगा। कोर्ट ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें इसे केवल दुष्कर्म की तैयारी बताया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई की और 10 फरवरी को हाईकोर्ट का 17 मार्च 2025 का विवादित आदेश पलट दिया। साथ ही, विशेष अदालत (POCSO), कासगंज द्वारा 23 जून 2023 को जारी मूल समन आदेश को बहाल कर दिया।
क्या था हाईकोर्ट का फैसला?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि पायजामे का नाड़ा खींचना या तोड़ना दुष्कर्म की तैयारी तो हो सकती है, लेकिन इसे दुष्कर्म की कोशिश नहीं माना जा सकता। इसी टिप्पणी को लेकर फैसला विवादों में आ गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने आपराधिक कानून के सिद्धांतों का गलत उपयोग किया है। पीठ ने अपने फैसले में साफ कहा आरोपों को देखने से ही स्पष्ट है कि आरोपियों की मंशा दुष्कर्म की कोशिश की थी। इसे केवल “तैयारी” कहना कानून की गलत व्याख्या है। इसलिए हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने दो आरोपियों के खिलाफ POCSO कानून के तहत दुष्कर्म की कोशिश के गंभीर आरोप फिर से बहाल कर दिए।
क्या है पूरा मामला?
10 नवंबर 2021 को एक महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। महिला के अनुसार वह अपनी 14 साल की नाबालिग बेटी के साथ रिश्तेदार के घर से लौट रही थी। गांव के तीन युवक पवन, आकाश और अशोक ने बेटी को बाइक से घर छोड़ने की पेशकश की। आरोप है कि तीनों ने रास्ते में लड़की से छेड़छाड़ की और उसके पायजामे का नाड़ा खींचा। लड़की की चीख सुनकर दो लोग मौके पर पहुंचे, जिसके बाद आरोपी भाग गए। इस मामले में विशेष POCSO अदालत ने आरोपियों को समन जारी किया था, जिसे हाईकोर्ट ने आंशिक रूप से कमजोर कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को पलटते हुए सख्त धाराएं फिर से लागू कर दी हैं।
फैसले का महत्व
यह फैसला महत्वपूर्ण इसलिए माना जा रहा है क्योंकि इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि नाबालिग के साथ ऐसी हरकतों को हल्के में नहीं लिया जाएगा। अदालत ने साफ किया कि अगर किसी कृत्य से दुष्कर्म की स्पष्ट मंशा दिखती है, तो उसे केवल “तैयारी” कहकर कम नहीं आंका जा सकता। यह निर्णय भविष्य के ऐसे मामलों में निचली अदालतों के लिए मार्गदर्शक साबित हो सकता है।

