
उनके साथ जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट हिमांशु अरोड़ा भी मौजूद थे। निरीक्षण के दौरान, तीनों जेलों के अधीक्षकों की उपस्थिति में, जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने कई विचाराधीन कैदियों और दोषियों से बातचीत की और उनकी समस्याओं को ध्यानपूर्वक सुना। उन्होंने जेल अधिकारियों को मौके पर ही निर्देश दिए कि वे कैदियों की जायज शिकायतों का तुरंत समाधान करें और आवश्यक कार्रवाई करें। उन्होंने कैदियों को मुफ्त कानूनी सहायता पाने के उनके अधिकार के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि जो कैदी अपना केस लड़ने के लिए निजी वकील का खर्च नहीं उठा सकते, वे जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से मुफ्त कानूनी सहायता प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए, जेलों के भीतर स्थापित ‘लीगल एड क्लीनिक’ (कानूनी सहायता केंद्र) से संपर्क करके एक आवेदन पत्र भरा जा सकता है। लंबे समय से जेल में बंद विचाराधीन कैदियों के मामलों पर विशेष ध्यान देते हुए, न्यायाधीश ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को निर्देश दिया कि वे कानून के अनुसार ऐसे कैदियों की रिहाई की प्रक्रिया तुरंत शुरू करें।
जेल दौरे के दौरान, उन्होंने तीनों जेलों में चल रहे ‘लीगल एड क्लीनिक’ के कामकाज की भी समीक्षा की। इसके बाद, उन्होंने सेंट्रल जेल में कैदियों के लिए तैयार किए जा रहे भोजन की गुणवत्ता और वहां की व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया। महिला जेल में, अपने छोटे बच्चों के साथ रह रही महिला कैदियों को खाद्य सामग्री भी वितरित की गई। अंत में, जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने तीनों जेलों के अधीक्षकों को निर्देश दिया कि वे सिविल रिट याचिका संख्या 182/2025 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2 दिसंबर 2025 और 21 अप्रैल 2026 को जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें।
उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि निरीक्षण के दौरान पाई गई कमियों को दूर किया जाए और की गई कार्रवाई की रिपोर्ट एक तय समय-सीमा के भीतर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, लुधियाना को सौंपी जाए।