कपास की फसल पर रखें नजर, कीट दिखें तो करें तुरंत सर्वे

Keep an eye on the cotton crop : बठिंडा। कपास उत्पादकता मिशन के तहत किसानों को फसल की बेहतर देखभाल, कीटों की पहचान और उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल को लेकर जागरूक किया जा रहा है। मेहता, गेहरी बटर, फुलो मिठी, अकलीयां कलां, घुडा, बंबीहा और पक्का खुर्द सहित विभिन्न गांवों में आयोजित प्रशिक्षण कैंपों में कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को कपास, धान, बासमती, मक्का और किसान ID से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दी।
विशेषज्ञों ने खास तौर पर किसानों को कपास के खेतों का नियमित सर्वे करने की सलाह दी है, ताकि सफेद मक्खी, भूरी माहू और गुलाबी सुंडी जैसे कीटों का समय रहते पता लगाकर नियंत्रण किया जा सके। विशेषज्ञों के अनुसार, आर्थिक नुकसान के स्तर से अधिक कीट पाए जाने पर ही आवश्यक रासायनिक स्प्रे किया जाना चाहिए। वहीं, 100 फूलों में 5 फूलों में गुलाबी सुंडी मिलने पर तत्काल नियंत्रण उपाय करने की सलाह दी गई है। इसके अलावा किसानों को धान में यूरिया का संतुलित इस्तेमाल, फसल में लगने वाले कीटों और बीमारियों की लगातार निगरानी तथा मिट्टी और पानी की नियमित जांच करवाने के लिए भी जागरूक किया गया।
बठिंडा के सब्जेक्ट मैटर एक्सपर्ट डॉ. हरदीप सिंह ने धान की फसल में बुवाई के 40-42 दिन बाद यूरिया डालने के लिए कहा। उन्होंने पत्ती लपेटने वाली सुंडी, गोभी की सुंडी और सफेद पीठ वाले टिड्डे (व्हाइट-बैक्ड लोकस्ट) व भूरे टिड्डे (ब्राउन लोकस्ट) के लिए खेत का लगातार सर्वे करने को कहा। राइस ब्लास्ट बीमारी को रोकने के लिए सफेद पीठ वाले टिड्डे को कंट्रोल करना ज़रूरी है। इसके साथ ही, लीफ ब्लाइट और फॉल्स कैंकर (डोडी रोग/हल्दी रोग) के लिए बताई गई फंगीसाइड का स्प्रे करना चाहिए। बठिंडा की असिस्टेंट एग्रीकल्चर ऑफिसर यादविर कौर ने फर्टिलाइज़र के सही इस्तेमाल के बारे में बताया। उन्होंने यूरिया फर्टिलाइज़र को किश्तों में बांटकर डालने के लिए कहा।
नाइट्रोजन का ज़्यादा इस्तेमाल करने से फसल में फालतू हरियाली (ग्रीन मास) बढ़ती है, साथ ही रस चूसने वाले कीड़ों और फंगल बीमारियों की समस्या बढ़ने की संभावना भी रहती है, जिनकी रोकथाम के लिए खेती का फालतू खर्च बढ़ जाता है। इसके साथ ही, उन्होंने रबी की फसल में फास्फोरस और खरीफ की फसल में जिंक का इस्तेमाल करने के लिए कहा। आखिर में, उन्होंने हर साल मिट्टी और पानी की जांच करवाने की सलाह दी, ताकि खाद का सही तरीके से इस्तेमाल किया जा सके।
