Rising Costs Dim Potters’ Diwali : मोगा। दीपावली पर घरों को रोशन करने वाले मिट्टी के दीयों के पीछे कुम्हारों और कारीगरों की महीनों की मेहनत छिपी है। मोगा में 30 से 40 वर्षों से इस पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े राज कुमार और हटड़ियां बनाने वाली निर्मला महंगाई, बढ़ती लागत और कम मुनाफे के बीच अपनी कला को बचाने में जुटे हैं। कभी 1500 से 2000 रुपये में मिलने वाली मिट्टी की ट्रॉली अब 7000 से 7500 रुपये तक पहुंच गई है। दिन-रात मेहनत के बावजूद उचित कीमत नहीं मिलने और मौसम की मार से कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट बना हुआ है। कारीगरों ने लोगों से इस दीपावली मिट्टी के दीये और हाथों से बनी हटड़ियां खरीदकर स्थानीय हुनर को बचाने की अपील की है।
आज भी दीपावली के अवसर पर घरों, दुकानों और मंदिरों में मिट्टी के दीये जलाकर त्योहार मनाया जाता है। लेकिन इन दीयों को तैयार करने वाले कुम्हारों और मिट्टी के कारीगरों की जिंदगी की कहानी त्योहार की जगमगाहट से बिल्कुल अलग है। एक ओर लोग दीपावली की तैयारियों में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर कारीगर दिन-रात मेहनत करके दीये और हटड़ियां तैयार करने में लगे हैं, ताकि दूसरों के घर रोशन हो सकें। मोगा में मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने के पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े राज कुमार पिछले 30 से 40 वर्षों से इस काम को कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि बचपन में अपने माता-पिता को मिट्टी के बर्तन बनाते देखकर उन्होंने यह कला सीखी। धीरे-धीरे काम में हाथ बंटाते हुए वह इस हुनर में माहिर हो गए और आज अपने परिवार के साथ मिलकर इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। राज कुमार के अनुसार, दीपावली के लिए दीये तैयार करने का काम कई महीने पहले शुरू करना पड़ता है। ऑर्डर पूरे करने के लिए परिवार सुबह तीन बजे से ही काम में जुट जाता है। मिट्टी लाने से लेकर उसे तैयार करने, चाक पर दीये बनाने, धूप में सुखाने और भट्ठी में पकाने तक हर चरण में काफी मेहनत करनी पड़ती है। 1500 से 2000 रुपये की मिट्टी की ट्रॉली अब 7 हजार रुपये से महंगी राज कुमार ने बताया कि पहले मोगा के आसपास के गांवों से मिट्टी आसानी से मिल जाती थी, लेकिन अब मिट्टी दूर से लानी पड़ती है।
पहले जिस मिट्टी की ट्रॉली के लिए 1500 से 2000 रुपये खर्च करने पड़ते थे, अब उसकी कीमत लगभग 7000 से 7500 रुपये तक पहुंच गई है। मिट्टी महंगी होने के साथ-साथ ईंधन और अन्य जरूरी सामान की लागत भी बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि मिट्टी को पहले सुखाया जाता है। इसके बाद उसे बारीक करके छाना जाता है और पानी मिलाकर आटे की तरह गूंथा जाता है। मिट्टी को कुछ दिन रखने के बाद चाक पर दीये बनाए जाते हैं। तैयार दीयों को धूप में सुखाकर भट्ठी में पकाया जाता है। एक ट्रॉली मिट्टी से लगभग एक लाख दीये तैयार हो सकते हैं, लेकिन इन्हें बनाने में करीब 40 दिन लग जाते हैं। कारीगरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मौसम भी है।
यदि बारिश हो जाए तो धूप में सूखने के लिए रखे कच्चे दीये खराब हो सकते हैं। वहीं, भट्ठी में तापमान कम या ज्यादा होने से भी दीये टूट जाते हैं या ठीक से पक नहीं पाते। ऐसे में कई दिनों की मेहनत और खर्च के बावजूद नुकसान उठाना पड़ता है। मेहनत के मुकाबले कमाई कम, परिवार का गुजारा करना मुश्किल राज कुमार ने बताया कि मिट्टी का काम उनकी पीढ़ियों से चला आ रहा है। इस व्यवसाय से परिवार का गुजारा तो हो जाता है, लेकिन बढ़ती महंगाई ने मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मिट्टी, ईंधन और अन्य सामान महंगा होने के बावजूद तैयार माल की उचित कीमत नहीं मिलती। इसके कारण मेहनत के अनुसार कमाई नहीं हो पाती। उन्होंने बताया कि दीपावली के बाद सर्दी और नमी के कारण मिट्टी का काम करीब तीन महीने तक बंद रहता है।
इस दौरान परिवारों को दूसरे स्थानों पर दिहाड़ी-मजदूरी करके घर का खर्च चलाना पड़ता है। फरवरी के मध्य के बाद मौसम अनुकूल होने पर काम दोबारा शुरू किया जाता है, लेकिन बारिश का मौसम आने पर फिर काम प्रभावित होने लगता है। राज कुमार ने चिंता जताई कि आज की युवा पीढ़ी इस पारंपरिक व्यवसाय से दूर होती जा रही है। कई युवा दूसरे कामों में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। सामाजिक सोच भी इस व्यवसाय को प्रभावित करती है। ऐसे में मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने की पारंपरिक कला को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
हाथों से तैयार होती हैं हटड़ियां, एक-एक हिस्से को जोड़ने में लगती है मेहनत दीपावली के अवसर पर मिट्टी की हटड़ियां तैयार करने वाली कारीगर निर्मला ने बताया कि वह भी पिछले करीब छह महीने से इस काम में जुटी हुई हैं। हटड़ियां बनाना साधारण काम नहीं है। इसके लिए मिट्टी को सुखाकर बारीक किया जाता है, फिर छानकर पानी के साथ गूंथा जाता है। इसके बाद हटड़ी के अलग-अलग हिस्से हाथों से तैयार करके जोड़े जाते हैं। हटड़ियों पर सजावट करने, छोटे-छोटे हिस्से जोड़ने, झालरें लगाने और रंग भरने में काफी समय लगता है। हर वस्तु को अलग से तैयार करना पड़ता है। सुनहरे और चांदी जैसे रंगों सहित सजावट में इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी महंगी हो गई है।
इसके बावजूद कारीगरों को तैयार माल की उचित कीमत नहीं मिल पाती। निर्मला ने बताया कि भट्ठी में हटड़ियां पकाते समय भी काफी नुकसान होता है। उनके अनुभव के अनुसार, कई बार तैयार किए गए माल का बड़ा हिस्सा खराब हो जाता है। मिट्टी की प्रकृति और आग के तापमान का सही अनुमान लगाना जरूरी होता है। थोड़ी-सी चूक होने पर कई दिनों की मेहनत बेकार हो जाती है। उन्होंने बताया कि केवल मिट्टी के काम से परिवार का गुजारा करना मुश्किल है। इसलिए उनके पति को भी दिहाड़ी-मजदूरी करनी पड़ती है, ताकि बच्चों की पढ़ाई और घर के अन्य खर्च पूरे किए जा सकें। इसके बावजूद परिवार इस पारंपरिक कला को जारी रखे हुए है।
चीनी सजावटी सामान के दौर में फिर बढ़ने लगी मिट्टी के दीयों की अहमियत कारीगरों के अनुसार, एक समय बाजार में चीन के बने बिजली वाले दीयों, रंग-बिरंगी लड़ियों और सजावटी सामान का चलन काफी बढ़ गया था। इससे पारंपरिक मिट्टी के दीयों की मांग प्रभावित हुई। हालांकि, अब लोग फिर से मिट्टी के दीयों की ओर लौट रहे हैं और पारंपरिक वस्तुओं के प्रति रुचि दिखाई दे रही है। कारीगरों का कहना है कि मिट्टी के दीये केवल सजावट का सामान नहीं हैं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और धार्मिक आस्था से जुड़े हुए हैं। इन्हें बनाने के पीछे कारीगरों की महीनों की मेहनत होती है। यदि लोग मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता दें, तो इससे न केवल पारंपरिक कला को बचाने में मदद मिलेगी, बल्कि इन कारीगर परिवारों को भी आर्थिक सहारा मिलेगा।
कारीगरों की अपील—इस दीपावली मिट्टी के दीये खरीदें राज कुमार और निर्मला ने लोगों से अपील की कि इस दीपावली पर मिट्टी के दीये और हाथों से तैयार की गई हटड़ियां जरूर खरीदें। उन्होंने कहा कि मिट्टी के दीये जलाने से त्योहार की परंपरा भी कायम रहती है और स्थानीय कारीगरों की मेहनत को सम्मान भी मिलता है। कारीगरों के मुताबिक, वे दिन-रात मेहनत करके लोगों के त्योहार को रोशन करने के लिए सामान तैयार करते हैं। ऐसे में यदि ग्राहक उनके बनाए उत्पादों को उचित कीमत पर खरीदें, तो उनके परिवारों को भी बेहतर जीवन जीने का अवसर मिल सकता है। दीपावली पर घरों में मिट्टी के दीये जलाकर रोशनी फैलाने के साथ उन हाथों की मेहनत को भी याद रखना जरूरी है, जो महीनों की मशक्कत के बाद इन दीयों को आकार देते हैं। त्योहार की असली खुशी तभी पूरी होगी, जब घरों के साथ-साथ इन कारीगरों के जीवन में भी खुशियों का उजाला पहुंचेगा।

