मोगा: भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाने वाला श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व देशभर में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। जन्माष्टमी को लेकर मंदिरों में विशेष सजावट की जा रही है तथा श्रद्धालुओं द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों की तैयारियां की जा रही हैं। इस अवसर पर बगलामुखी मंदिर के आचार्य नंदलाल ने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के धार्मिक महत्व, व्रत की महत्ता तथा सनातन परंपराओं से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार साझा किए।
आचार्य नंदलाल ने कहा कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में हुआ था। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना, अधर्म के विनाश और भक्तों की रक्षा के लिए अवतार लिया। यही कारण है कि जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक भावना के साथ मनाया जाता है।
व्रत केवल भोजन छोड़ना नहीं
जन्माष्टमी के व्रत के संबंध में आचार्य नंदलाल ने कहा कि व्रत का अर्थ केवल अन्न अथवा भोजन का त्याग करना नहीं है, बल्कि यह स्वयं को बुराइयों से दूर रखने और अच्छे कार्य करने का संकल्प है। इस दिन भगवान का भजन-पूजन, धार्मिक पाठ, जरूरतमंदों की सहायता, दान-पुण्य, सत्य बोलने तथा गलत कार्यों से दूर रहने का संकल्प लेना व्रत की वास्तविक भावना है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार ही व्रत रखना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो तो परिवार के बड़ों अथवा चिकित्सक की सलाह लेना उचित है।
वर्षा को लेकर धार्मिक मान्यता
जन्माष्टमी के दिन वर्षा होने की धार्मिक मान्यता के बारे में उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का प्रसंग यमुना नदी और वर्षा से जुड़ा हुआ है। इसी कारण अनेक स्थानों पर जन्माष्टमी के अवसर पर होने वाली वर्षा को भगवान की कृपा और प्रसन्नता से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे किसी अनिवार्य शास्त्रीय नियम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
केक की जगह भगवान को भोग लगाने की परंपरा
जन्माष्टमी पर केक काटने की आधुनिक परंपरा के संबंध में आचार्य नंदलाल ने कहा कि सनातन धर्म की पारंपरिक पूजा पद्धति में भगवान के जन्मोत्सव पर केक काटने का उल्लेख नहीं मिलता। सनातन परंपरा में भगवान को प्रेम और श्रद्धा के साथ भोग लगाने की परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण को छप्पन भोग अर्पित करने की परंपरा भी प्रचलित है। इसलिए जन्माष्टमी के अवसर पर भारतीय परंपरा के अनुसार मिठाइयां, फल तथा विभिन्न प्रकार के व्यंजन भगवान को भोग के रूप में अर्पित किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान के लिए सबसे महत्वपूर्ण वस्तु श्रद्धा और भक्त का भाव है।
प्रेम और भाईचारे का संदेश देता है पर्व
आचार्य नंदलाल ने देशवासियों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि इस पावन पर्व को प्रेम, श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाना चाहिए। मंदिरों को आकर्षक ढंग से सजाने, भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करने तथा बच्चों को कन्हैया के स्वरूप में तैयार करने से पर्व की खुशी और बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि जन्माष्टमी केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और उनके संदेश को अपने आचरण में उतारने का भी अवसर है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से अपील की कि जन्माष्टमी के दिन बुराइयों का त्याग करने, अच्छे कर्म करने, जरूरतमंदों की सहायता करने तथा समाज में प्रेम, सद्भाव और भाईचारे की भावना को मजबूत करने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण सभी के जीवन में सुख-शांति, उन्नति और समृद्धि प्रदान करें तथा सभी देशवासियों पर अपनी कृपा बनाए रखें।
📍 Location: मोगा

