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किसान आंदोलन से Textile Industry को रोजाना लगा रही 1000 करोड़ की चपत

लुधियाना : किसान आंदोलन की वजह से जहां जनता त्रस्त है, वहीं कारोबारी भी परेशानी में फंसे बैठे हैं। साइकिल, ऑटो पार्ट्स, सिलाई मशीन और अन्य उद्योगों की तरह इस आंदोलन का प्रभाव टैक्सटाइल और हौजरी कारोबार पर बुरी तरह ठप हाे रहा हैं। फैडरेशन ऑफ ऑल टैक्सटाइल ट्रेडिंग एंड मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन ऑफ लुधियाना की मानें तो रोजाना 1000 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुक्सान इंडस्ट्री को उठाना पड़ रहा है। पिछले करीब 10 दिनों से किसान हरियाणा बॉर्डर पार करने पर अड़े हैं और सरकार भी उनके सामने डट गई है। रास्ते ‘सील’ होने से तैयार माल की ट्रांसपोर्टेशन रुक गई है। इससे कारोबारियों के उत्पाद फंस गए हैं।

इतना ही नहीं माल की डिलीवरी न होने का सीधा असर उत्पादन पर भी पड़ रहा है। औद्योगिक इकाइयों को अपना उत्पादन आधा करना पड़ रहा है। यहां बता दें, फैडरेशन ऑफ ऑल टैक्सटाइल ट्रेडिंग एंड मैन्युफैक्चरिं एसोसिएशन ऑफ लुधियाना के पदाधिकारी सतलुज क्लब में अपने उद्योगों में आ रही दिक्कतों को प्रैस से साझा करने के लिए एकत्रित हुए थे। इस दौरान फैडरेशन के प्रधान तरुण जैन बावा ने बताया कि टैक्सटाइल और हौजरी इकाइयों में रोजाना करीब 2000 करोड़ रुपए के उत्पादों का उत्पादन होता है। किसान आंदोलन की वजह से तैयार माल शंभू बॉर्डर के रास्ते नई दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में जाता है। वह रास्ता सरकार और किसानों के आमने-सामने डटे होने के कारण बंद पड़ा है। आगे कारोबारियों तक उत्पाद न पहुंचने का सीधा असर प्रॉडक्शन पर पड़ रहा है।

सभी इकाइयों को अपना उत्पादन आधा या इससे भी कम करना पड़ा है। उनका कहना है हालांकि कपड़ा, हौजरी, शॉल समेत टैक्सटाइल कारोबार से जुड़े अन्य उद्योग ज्यादातर मध्यम और छोटे उद्योगों में आते हैं। ‘अन ऑरगेनाइज्ड’ सैक्टर होने के कारण इनमें उत्पादन के आंकड़ों का सटील आकलन नहीं किया जा सकता। कारोबारियों ने सरकार और किसानों से अपील की है कि वे उन्हें इस मुसीबत से बचायें। यहां बता दें, फैडरेशन ऑफ ऑल टैक्सटाइल ट्रेडिंग एंड मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन ऑफ लुधियाना शहर के करीब एक दर्जन हौजरी-कपड़ा उत्पादन व कारोबार करने वाले संगठन शामिल हैं। यह सभी संगठन अपने-अपने क्षेत्र में खासा प्रभाव रखते हैं।

ज्यादातर काम ठेके पर, काम बंदी से कारीगरों को नुक्सान

हौजरी और कपड़ा इकाइयों में ज्यादातर काम ठेके के आधार पर हो रहा है। यानी जितना काम उतनी कमाई। उत्पादन आधा रह जाने से कारीगरों और कर्मियों की कमाई भी आधी रह गई है। यही हालात जारी रहे तो उन्हें घर चलाना मुश्किल हो जायेगा। ठेकेदार अपने नीचे काम करने वाले कारीगरों को हटाने पर मजबूर होगा।

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