मोगा: त्योहारों का सीजन शुरू होते ही मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगरों के काम में भी रौनक लौट आई है। आगामी 29 तारीख को मनाए जाने वाले सुहागिनों के प्रमुख पर्व करवा चौथ को लेकर कारीगरों ने पारंपरिक मिट्टी के करवे बनाने का काम शुरू कर दिया है। कारीगर सुबह से देर शाम तक करवे तैयार करने में जुटे हुए हैं। उन्हें उम्मीद है कि इस बार त्योहारों के सीजन में बिक्री अच्छी रहेगी और परिवार की आर्थिक स्थिति को कुछ सहारा मिलेगा।
मिट्टी का काम करने वाले कारीगर सतपाल ने बताया कि त्योहारों का सीजन शुरू होते ही काम बढ़ने से चेहरे पर खुशी तो आती है, लेकिन लगातार बढ़ रही महंगाई ने इस पारंपरिक कारोबार को मुश्किल बना दिया है। उन्होंने कहा कि मिट्टी, ईंधन, बूरा और पाथियों समेत करवे तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के दाम काफी बढ़ गए हैं। मिट्टी की एक ट्रॉली करीब 8 हजार रुपये में पड़ती है, जबकि भट्ठी में करवे पकाने के लिए ईंधन का खर्च भी काफी अधिक हो गया है।
सतपाल ने बताया कि मिट्टी के करवे तैयार करने की प्रक्रिया काफी मेहनत वाली है। सबसे पहले मिट्टी को सुखाकर बारीक किया जाता है। इसके बाद मिट्टी को पानी से साफ कर उसके पिंडे तैयार किए जाते हैं। फिर इसे आटे की तरह गूंथकर चाक पर ले जाया जाता है, जहां एक-एक करवा तैयार किया जाता है। करवों को सुखाने के बाद उन पर रंग किया जाता है और अंत में भट्ठी में पकाया जाता है। कई बार भट्ठी में करवों के टूट जाने से कारीगरों को काफी नुकसान भी उठाना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि बाजार में करवे बेचने के दौरान ग्राहक कीमत को लेकर काफी मोलभाव करते हैं। वहीं, आजकल कई लोग मिट्टी के पारंपरिक करवे की जगह गड़वी का इस्तेमाल करने लगे हैं, जिससे मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगरों के कारोबार पर असर पड़ा है।
कारीगर सतपाल ने बताया कि परिवार के सदस्य भी इस काम में हाथ बंटाते हैं। बच्चे पढ़ाई के बाद काम में सहयोग करते हैं, जबकि पति-पत्नी सुबह से रात तक मिट्टी के साथ मेहनत करते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि लोग पारंपरिक मिट्टी के करवों को प्राथमिकता देंगे, ताकि इस कला से जुड़े परिवारों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सके।
📍 Location: मोगा

