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हुक्मनामा श्री हरमंदिर साहिब जी 15 जुलाई 2025

July 15, 2025

हुक्मनामा श्री हरमंदिर साहिब जी 15 जुलाई 2025

Today Hukamnama 15 July 2025 : सूही महला १ घरु ९ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ कचा रंगु कसु्मभ का थोड़ड़िआ दिन चारि जीउ ॥ विणु नावै भ्रमि भुलीआ ठगि मुठी कूड़िआरि जीउ ॥ सचे सेती रतिआ जनमु न दूजी वार जीउ ॥१॥ रंगे का किआ रंगीऐ जो रते रंगु लाइ जीउ ॥ रंगण वाला सेवीऐ सचे सिउ चितु लाइ जीउ ॥१॥ रहाउ ॥ चारे कुंडा जे भवहि बिनु भागा धनु नाहि जीउ ॥ अवगणि मुठी जे फिरहि बधिक थाइ न पाहि जीउ ॥ गुरि राखे से उबरे सबदि रते मन माहि जीउ ॥२॥ चिटे जिन के कपड़े मैले चित कठोर जीउ ॥ तिन मुखि नामु न ऊपजै दूजै विआपे चोर जीउ ॥ मूलु न बूझहि आपणा से पसूआ से ढोर जीउ ॥३॥ नित नित खुसीआ मनु करे नित नित मंगै सुख जीउ ॥ करता चिति न आवई फिरि फिरि लगहि दुख जीउ ॥ सुख दुख दाता मनि वसै तितु तनि कैसी भुख जीउ ॥४॥ बाकी वाला तलबीऐ सिरि मारे जंदारु जीउ ॥ लेखा मंगै देवणा पुछै करि बीचारु जीउ ॥ सचे की लिव उबरै बखसे बखसणहारु जीउ ॥५॥ अन को कीजै मितड़ा खाकु रलै मरि जाइ जीउ ॥ बहु रंग देखि भुलाइआ भुलि भुलि आवै जाइ जीउ ॥ नदरि प्रभू ते छुटीऐ नदरी मेलि मिलाइ जीउ ॥६॥ गाफल गिआन विहूणिआ गुर बिनु गिआनु न भालि जीउ ॥ खिंचोताणि विगुचीऐ बुरा भला दुइ नालि जीउ ॥ बिनु सबदै भै रतिआ सभ जोही जमकालि जीउ ॥७॥ जिनि करि कारणु धारिआ सभसै देइ आधारु जीउ ॥ सो किउ मनहु विसारीऐ सदा सदा दातारु जीउ ॥ नानक नामु न वीसरै निधारा आधारु जीउ ॥८॥१॥२॥

Today Hukamnama 15 July 2025 अर्थ : सूही महला १ घरु ९ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ जिस प्रकार कुसुंभ के फूल का रंग कच्चा ही होता है और थोड़े चार दिन ही रहता है। वैसे ही परमात्मा के नाम बिना जीव-स्त्रियाँ भ्रम में ही भूली हुई हैं और उन झूठी स्त्रियों को काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार रूपी ठगों ने लूट लिया है। सच्चे प्रभु के नाम में मग्न रहने वाली जीव-स्त्रियों का दूसरी बार जन्म नहीं होता ॥ १ ॥ जो पहले ही प्रभु के प्रेम-रंग में रंगकर रंगे हुए हैं, उन रंगे हुओं को दोबारा रंगने की कोई जरूरत नहीं। उस रंगने वाले प्रभु की उपासना करनी चाहिए और उस परम-सत्य से ही चित्त लगाना चाहिए।॥ १॥ रहाउ ॥ चाहे कोई चारों दिशाओं में भी घूमता रहे लेकिन भाग्य के बिना नाम-धन हासिल नहीं होता। यदि अवगुणों की ठगी हुई जीव-स्त्री शिकारी की तरह जगलों में भटकती रहे, तो उसे परमात्मा के दरबार में स्थान नहीं मिलता। जिनकी गुरु ने रक्षा की है, वे भवसागर में डूबने से बच गए। वे अपने मन में शब्द में ही रंगे रहते हैं।॥ २॥

जिनके वस्त्र तो सफेद हैं, मगर चित बड़े मैले और निर्दयी हैं, उनके मुँह से परमात्मा का नाम कभी निकलता ही नहीं। वे द्वैतभाव में फंसे हुए प्रभु के चोर हैं। जो अपने मूल परमात्मा को नहीं समझते, वे पशु एवं जानवर हैं।॥ ३॥ उनके मन सदैव खुशियाँ मनाते रहते हैं और वे सदैव ही सुख की कामना करते रहते हैं। उन्हें परमात्मा कभी याद ही नहीं आता और फिर उन्हें बार-बार दुख लगते रहते हैं। जिसके मन में सुख एवं दुख देने वाला दाता बस जाता है, उसके तन में भूख कैसे लग सकती है॥ ४॥ जिस जीव के जिम्में कर्मों का कर्जा देना शेष रहता है, उसे यमराज की कचहरी में बुलाया जाता है। निर्दयी यम उसके सिर पर चोट मारता है। यमराज उसके कर्मो का विचार करके उससे पूछताछ करता है और उससे लेखा मांगता है, जो उसने देना होता है। सच्चे परमात्मा में वृत्ति द्वारा ही जीव कर्मो का लेखा देने से बचता है। क्योंकि क्षमाशील परमेश्वर उसे क्षमा कर देता है॥ ५ ॥

यदि भगवान के सिवा किसी अन्य को मित्र बना लिया जाए, वह तो मर कर स्वयं मिट्टी में ही मिल जाता है। वह दुनिया के बहुत सारे रंग-तमाशे देखकर भटक गया है और भटक-भटक जन्मता-मरता रहता है। वह प्रभु की कृपा-दृष्टि से ही जन्म-मरण से छूटती है और प्रभु कृपा-दृष्टि द्वारा उसे साथ मिला लेता है। ६॥  हे गाफिल-ज्ञानहीन इन्सान ! गुरु के बिना ज्ञान की खोज मत कर। तू दुविधा में फँसकर ख्वार होता रहता है। तेरा किया हुआ बुरा-भला दोनों तेरे साथ ही रहते हैं। शब्द के बिना जीवों को मौत का डर बना रहता है। सारी दुनिया को भृम ने अपनी दृष्टि में रखा हुआ है। ७ ॥ जिस परमात्मा ने जगत् को पैदा करके उसे स्थापित किया हुआ है, वह ही सबको आधार देता है। उस दाता को अपने मन से क्यों भुलाएँ ? जो जीवों को हमेशा देने वाला है। हे नानक ! मुझे बेसहारा जीवों को सहारा देने वाला प्रभु का नाम कभी न भूले॥ ८॥ १ ॥ २॥

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