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नई दिल्ली। रात की खामोशी अब विश्राम नहीं, बल्कि स्क्रीन की चमक में डूबकर एक नई सोच को जन्म दे रही है, जो अनजाने में पूरी पीढ़ी का मन गढ़ रही है। उंगलियों की निरंतर हलचल ने सोच की गहराई को कमज़ोर कर दिया है, और आभासी उपलब्धियों का आकर्षण वास्तविक जीवन की प्राथमिकताओं को.