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अस्थायी पुल के हटने से 7 गांवों का टूटा संपर्क… नाव बनी लाेगाें के लिए सहारा, देश की आजादी भी इनके लिए नहीं रखती कोई मायने

August 12, 2024

अस्थायी पुल के हटने से 7 गांवों का टूटा संपर्क… नाव बनी लाेगाें के लिए सहारा, देश की आजादी भी इनके लिए नहीं रखती कोई मायने

गुरदासपुर (अवतार सिंह) : जिला गुरदासपुर के सीमावर्ती कस्बे दीनानगर के अधीन आते मकोड़ा पत्तन में रावी नदी पर बने अस्थायी पुल के हटने से रावी नदी के पार बसे 7 गांवों का भारत से संपर्क टूट गया हैं। इन गांवों तक पहुंचने का रास्ता सिर्फ नाव से है। आजादी के बाद रावी नदी के पार 14 गांव बसे थे, लेकिन आजादी के इतने बीत जाने के बावजूद किसी भी सरकार ने इन गांवों की सुध नहीं ली, जिसके कारण कई लोग यहां से चले गए। यह पर केवल 7 गांव हैं। रावी नदी पर पक्का पुल न होने के कारण इन लोगों के पास कोई भी सुख-सुविधा नहीं है, जिसके कारण आज इनके लिए देश की आजादी कोई मायने नहीं रखती।

रावी नदी के उस पार रहने वाले गांव के लोगों का कहना है कि भारत-पाक सीमा से सटे करीब एक दर्जन गांवों के लोग भारत का हिस्सा हैं, लेकिन बरसात के दिनों में इन गांवों के लोग खुद को असहाय महसूस करते हैं। आजादी के इतने साल बाद भी पुल के उस पार रहने वाले 7 गांवों के लोग खुद को गुलाम मानते हैं, क्योंकि जब भी यह अस्थायी पुल हटाया जाता है तो ये लोग देश से कट जाते हैं। कई लोग तो यहां तक ​​कहते हैं कि आजकल हमें पता ही नहीं चलता कि हम किस देश के नागरिक हैं क्योंकि यह इलाका दो नदियों के पार और एलओसी के पास है।

बरसात के दिनों में नहर विभाग द्वारा बनाया गया प्लाटून पुल टूट जाता है और लोगों को आने-जाने के लिए एक ही नाव का सहारा लेना पड़ता है। जो कभी-कभी नदी में पानी का स्तर अधिक होने के कारण पता नहीं चल पाता है और इसके पार बसे 7 गांव टापू बन जाते हैं और फिर लोगों के आने-जाने के लिए कोई साधन नहीं रहता है। रावी नदी के पार के 7 गांवों भारिल, तुरबानी, रायपुर चिब, मामी चक्रांगन, काजले, झुंबर, लस्यान आदि के लोग अक्सर सरकार से हर साल पक्के पुल की उम्मीद करते हैं, लेकिन भराेसे के अलावा कुछ नहीं मिलता।

उल्लेखनीय है कि मकोरा पाटन में दो नदियों का संगम होता है। एक जम्मू-कश्मीर से आने वाली बरसाती नदी और दूसरी शिवालिक की पहाड़ियों से निकलकर माधोपुर से गुजरती हुई सदाबहार नदी रावी नदी में इसी स्थान पर मिलती है और एक झील का रूप ले लेती है। इस स्थान पर हर वर्ष अक्टूबर-नवंबर माह में विभाग द्वारा एक अस्थायी प्लाटून पुल लगाया जाता है और बरसात का मौसम आने पर इसे हटा दिया जाता है, जो नदी पार करने का एकमात्र साधन है, जिसके माध्यम से नदी पार करने वाले किसान अपने ट्रैक्टर खींचते हैं। ट्रॉलियों में वे खेती के लिए जरूरी उपकरण लेकर चलते हैं। इस बार विभाग द्वारा 15 दिन पहले ही प्लाटून पुल को हटा दिया गया है, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता हैं।

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