नेशनल डेस्क: कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने सोमवार को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 की कड़ी आलोचना की और केंद्र सरकार पर इसे शिक्षा के क्षेत्र में “सत्ता का केंद्रीकरण, व्यावसायीकरण और सांप्रदायिकरण” करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार ने शिक्षा में अपने तीन मुख्य एजेंडा के तहत इन मुद्दों को प्राथमिकता दी है: केंद्र में सत्ता का केंद्रीकरण, शिक्षा के व्यावसायीकरण और निजीकरण, और पाठ्यक्रम और संस्थानों में सांप्रदायिक विचारों को बढ़ावा देना।
निर्णय लेने में राज्य सरकारों को बाहर रखा
सोनिया गांधी ने कहा, “केंद्र सरकार ने पिछले एक दशक में शिक्षा के क्षेत्र में केवल सत्ता का केंद्रीकरण और व्यावसायीकरण पर ध्यान केंद्रित किया है। यही कारण है कि आज शिक्षा की गुणवत्ता और पहुंच पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।” उन्होंने आरोप लगाया कि इस नीति के कारण भारत के बच्चों और युवाओं की शिक्षा पर सरकार की “गहरी उदासीनता” को छुपाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण निर्णय लेने में राज्य सरकारों को बाहर रखा गया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों के मंत्री शामिल होते हैं, सितंबर 2019 से बैठक नहीं कर रहा है।
योजना लागू करने के लिए राज्यों को मजबूर किया
सोनिया गांधी ने सरकार पर आरोप लगाया कि उसने समग्र शिक्षा अभियान (एसएसए) के लिए अनुदान रोक दिया है और राज्य सरकारों को प्रधानमंत्री योजना लागू करने के लिए मजबूर किया है। उन्होंने कहा, “सरकार ने बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम को लागू करने के लिए जरूरी वित्तीय सहायता देने से इनकार कर दिया है।”
यूजीसी के नए दिशा-निर्देशों पर उठाए सवाल
उच्च शिक्षा पर भी सोनिया गांधी ने अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने 2025 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए दिशा-निर्देशों पर सवाल उठाया, जिनके अनुसार विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति में राज्य सरकारों की भूमिका कम की जा रही है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने राज्यपालों को कुलपतियों के चयन में अधिक शक्ति दी है, जो संघवाद के लिए गंभीर खतरा हो सकता है।
सरकारी स्कूल बंद किए, निजी स्कूलों की संख्या बढ़ी
सोनिया गांधी ने स्कूली शिक्षा में निजीकरण की ओर बढ़ते कदम की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि एनईपी “स्कूल परिसरों” को बढ़ावा देती है, जिससे आरटीई अधिनियम के तहत गारंटीकृत सरकारी स्कूलों की अवधारणा कमजोर हो रही है। इसके कारण, 2014 से अब तक लगभग 90,000 सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं और निजी स्कूलों की संख्या बढ़ी है।
उन्होंने विश्वविद्यालयों को वित्तपोषित करने के लिए ब्लॉक अनुदान के बजाय उच्च शिक्षा वित्तपोषण एजेंसी (HEFA) की ओर बढ़ने की आलोचना की। उनका कहना था कि इससे विश्वविद्यालयों को ऋण लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे छात्रों की फीस में वृद्धि हो रही है। सोनिया गांधी ने कहा, “विश्वविद्यालयों द्वारा इन ऋणों का 78% से 100% छात्र शुल्क के माध्यम से चुकाया जा रहा है।”
नफरत फैलाने की कोशिश हो रही
सांप्रदायिकता के मुद्दे पर सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार शिक्षा प्रणाली के माध्यम से नफरत फैलाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने NCERT की पाठ्यपुस्तकों में बदलाव का उदाहरण दिया, जिसमें महात्मा गांधी की हत्या और मुग़ल इतिहास के संदर्भों को हटा दिया गया था। इसके साथ ही, उन्होंने शैक्षणिक योग्यता के बजाय विचारधारात्मक आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति की आलोचना की।