
मुंबई: जब बात हो ‘पंचायत’ की, तो राजनीति के साथ साथ स्वाद की भी चर्चा जरूरी हो जाती है। गांव की गलियों से उठती वो लौकी की खुशबू, नुक्कड़ पर तली जा रही समोसे की खनक, और चाय की प्याली के साथ पकती राजनीति ‘पंचायत सीजन 4’ एक बार फिर यही देसी तड़का लेकर लौट आया है।
24 जून से प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम होने जा रहा ये नया सीज़न, सिर्फ एक और चुनावी मुकाबला नहीं है, बल्कि खाने और भावनाओं का वो मेल है जो हर हिंदुस्तानी को अपने गांव की याद दिला देता है।
-फुलेरा की पॉलिटिक्स में लौकी बनी नेता
‘पंचायत’ के चाहने वालों को लौकी से पुराना रिश्ता है। पहले जहां ये सब्ज़ी उपेक्षित मानी जाती थी, अब वो गांव की चुनावी रणनीतियों का अहम हिस्सा बन गई है। नीना गुप्ता का किरदार मंजू देवी तो लौकी को अपने चुनाव प्रचार का प्रतीक बना चुकी हैं।
नीना खुद मानती हैं कि अब लौकी उनके दिल के करीब है “पहले जो सब्ज़ी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं थी, आज वो मेरी पहचान बन गई है।”

-आलू की राजनीति और समोसे की साज़िश
इस बार मुकाबला है मंजू देवी बनाम क्रांति देवी (सुनीता राजवार) का। और राजनीति में शामिल हो गए हैं आलू और समोसे। एक सीन में बनराकस का डायलॉग “ऊपर का मैदा उनकी तरफ़ से है, अंदर का आलू हमारा” सोशल मीडिया पर पहले ही वायरल हो चुका है। इस पंचलाइन से ये तो साफ़ है कि इस बार गांव की पॉलिटिक्स सिर्फ नारों तक सीमित नहीं, वो अब रसोई से निकल कर थाली तक पहुंच चुकी है।
क्रांति देवी की टीम ‘आलू’ के दम पर वोट बटोर रही है, तो मंजू देवी की टीम लौकी और खीर से जनता को रिझा रही है। यहां घूस भी खीर के रूप में दी जाती है और गठबंधन समोसे की प्लेटों पर तय होते हैं।
-खाना एक किरदार, एक एहसास
‘पंचायत’ में खाना कोई साइड डिश नहीं है, वो खुद एक कैरेक्टर है। चाय की दुकान पर बैठकर होने वाली चर्चाएं, प्रधान जी की लौकी प्रेम चर्चा, या फिर चुनावी मीटिंग में चटनी के बिना अधूरी समोसे की ट्रे हर सीन में खाना सिर्फ पेट नहीं, दिल भी भरता है।
सुनीता राजवार ने सही कहा, “खाना यहां सिर्फ खाने के लिए नहीं है, बल्कि वो पॉलिटिक्स में पावर प्ले का हिस्सा है।”
-एक चटपटी वापसी, एक देसी उत्सव
टीवीएफ द्वारा प्रोड्यूस की गई और दीपक कुमार मिश्रा द्वारा निर्देशित ‘पंचायत 4’, केवल कहानी नहीं, गांव की मिट्टी, लोगों की जुबान और रसोई की खुशबू का असली दस्तावेज़ है। चंदन कुमार की लेखनी में वो देसीपन है, जो किसी भी दर्शक को गांव का हिस्सा बना देती है।
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