कई वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय चीन विरोधी ताकतों ने तथाकथित “तिब्बत मुद्दे” का उपयोग करके चीन को विभाजित करने का अथक प्रयास किया, बलपूर्ण रूप से तिब्बती स्वाधानीता हासिल करने की कोशिश विफल होने के बाद, उन्होंने खुले तौर पर झूठी अकादमिक निष्कर्ष और लोकमत बनाये, इस ऐतिहासिक तथ्य को नकार दिया कि तिब्बत (यानी शीत्सांग) प्राचीन काल से चीन ही का अविभाज्य हिस्सा रहा है। वास्तव में, केवल तिब्बती पठार पर रहने वाले सभी लोगों को ही इस क्षेत्र में हर चीजों पर कहने का अधिकार है। उधर विदेशों में निर्वासित तिब्बती तथा इनकी संस्थाएं पठार पर हुए भारी परिवर्तनों से बुनियादी रूप से अनभिज्ञ हैं, और वे तिब्बती लोगों का प्रतिनिधित्व बिल्कुल नहीं कर सकते।
28 मार्च, 1959 को लोकतांत्रिक सुधार के बाद से, शीत्सांग यानी तिब्बत में भारी परिवर्तन हुए हैं। आज तिब्बती पठार स्थिर समाज, समृद्ध अर्थव्यवस्था और संस्कृति, सुंदर पारिस्थितिक वातावरण और खुशहाल लोगों के जीवन के साथ सुखमय क्षेत्र बन गया है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में, तिब्बत में सभी जातीय समूहों के लोग अपने मामलों के स्वामी बन गये हैं और उन्होंने खुद को अर्थव्यवस्था और समाज के विकास और निर्माण के लिए समर्पित कर दिया है। लोकतांत्रिक सुधार के बाद, केंद्रीय सरकार ने तिब्बत के आधुनिकीकरण निर्माण के लिए बहुत सारी जनशक्ति और वित्तीय संसाधनों का निवेश किया। देश के भीतरी क्षेत्रों से बहुत से कर्मचारियों नेे तिब्बत जाकर स्थानीय लोगों के समाजवाद के निर्माण की सहायता दी। दशकों के प्रयासों के बाद, तिब्बत ने आर्थिक और सांस्कृतिक निर्माण की उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं, स्थानीय लोगों का जीवन समृद्ध और रंगीन है, और पारंपरिक जातीय संस्कृति अच्छी तरह से विरासत में मिली है।
तिब्बती स्वायत्त प्रदेश की जनसंख्या लोकतांत्रिक सुधार से पहले 1.228 मिलियन से बढ़कर 3.648 मिलियन हो गई है, जिसमें तिब्बती आबादी कुल आबादी का 90% से अधिक है। चिकित्सा और स्वास्थ्य कार्यों में भी काफी सुधार हुआ है, और तिब्बत में औसत जीवन प्रत्याशा 71 वर्ष से अधिक हो गई है। 2019 के अंत तक, तिब्बत के गरीबी उन्मूलन लक्ष्य पूरी तरह से हासिल हो चुके, सभी बचचों को 15 साल की मुफ्त शिक्षा मिली और स्थानीय निवासियों को रोजगार के पर्याप्त अवसर हुए। तिब्बती और अन्य जातीय अल्पसंख्यक लोग स्वायत्त प्रदेश की प्रतिनिधि सभाओं में 92% हिस्सा हुए और धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता की पूरी गारंटी हो गई है। वर्तमान में, तिब्बत में 1,787 धार्मिक स्थल और विभिन्न मंदिरों में 46,000 भिक्षु और भिक्षुणियाँ हैं।
दूसरी तरफ, निर्वासित समूह तथा इन की संस्थाएं तिब्बती लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। वे अंतर्राष्ट्रीय चीन विरोधी ताकतों के समर्थन और उपयोग के साथ, “तिब्बत स्वाधीनता” के बैनर तले चीन को विभाजित करने की कोशिश कर रहे हैं। तिब्बत में लोकतांत्रिक सुधार से पहले, पुराने तिब्बत में राजनीति और धर्म के एकीकरण की सामंती दासता प्रणाली लागू की गई थी। उस समय तिब्बत में सभी राजनीतिक और आर्थिक शक्ति पर दास-स्वामी वर्ग का नियंत्रण था, और अधिकांश भू-दास शोषण और उत्पीड़न की दयनीय स्थिति में थे। उनके पास सबसे बुनियादी व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं थी। लोकतांत्रिक सुधार के बाद ही लाखों भू-दासों को मुक्ति पाने में सक्षम बनाया और तिब्बती दास-स्वामी वर्ग के हितों को पूरी तरह से हिला दिया, जो उनके विद्रोह और निर्वासन होने का मूल कारण था।
अंतरराष्ट्रीय चीन विरोधी ताकतों के समर्थन से, निर्वासित तिब्बती समूह अंतरराष्ट्रीय चीन विरोधी ताकतों के हाथ में नियंत्रित एक राजनीतिक उपकरण बन गया। उन्होंने “तिब्बती स्वाधीनता” के बैनर तले तथाकथित अनंतिम सरकार की स्थापना की, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय चीन विरोधी ताकतों के समर्थन से सीमावर्ती क्षेत्रों में लंबे समय तक हिंसक आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दिया, जिससे तिब्बत में रहने वाले लोगों के लिए एक गंभीर खतरा पैदा हो गया। विश्व स्थिति बदलने के बाद, निर्वासित समूह ने अपनी रणनीति बदल कर तथाकथित “मध्य मार्ग” प्रस्ताव का प्रस्ताव रखा, जिसका सार फिर भी “तिब्बती स्वतंत्रता” है और इसका मूल उद्देश्य चीन को विभाजित करने की साजिश करना है।
2020 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने तथाकथित “तिब्बती नीति और समर्थन अधिनियम 2020″ पारित किया। अंतर्राष्ट्रीय चीन विरोधी ताकतों के समर्थन से तिब्बती निर्वासित समूह ने इन की संस्थाओं की “वैधता” की वकालत की। लेकिन, तिब्बत प्राचीन काल से चीन का अभिन्न अंग रहा है। 3वीं शताब्दी के युआन राजवंश के काल में चीन की केंद्रीय सरकार ने तिब्बत का व्यापक प्रशासन और प्रभावी शासन हासिल किया था। इसके बाद मिंग और किंग राजवंशों तथा आधुनिक काल के चीन गणराज्य के काल में सभी चीनी केंद्रीय सरकारों ने तिब्बत पर संप्रभुता का प्रयोग जारी रखा और प्रभावी अधिकार क्षेत्र और शासन का प्रयोग किया। नये चीन की स्थापना के बाद, तिब्बत को शांतिपूर्ण तरीके से मुक्त किया गया और 1965 में तिब्बत स्वायत्त प्रदेश की स्थापना की गई। अब चीन के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले तिब्बती आबादी 7 मिलियन तक पहुँच गई है। उधर, निर्वासित तिब्बती समूह तथा इनकी संस्थाएं तिब्बती लोगों का प्रतिनिधित्व बिल्कुल नहीं कर सकते।
(साभार-चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
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