
नेशनल डेस्क: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में धर्म जागरण न्यास के प्रांत कार्यालय के उद्घाटन कार्यक्रम में बोलते हुए धर्म, कर्तव्य और भारतीय संस्कृति को लेकर कई अहम बातें कहीं। उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ या भगवान के लिए नहीं होता, बल्कि यह समाज और मानवता के लिए होता है।
मोहन भागवत ने कहा, “हमारे देश के इतिहास में धर्म की रक्षा के लिए अनगिनत बलिदान हुए हैं। सिर कटे, यज्ञोपवीत (जनेऊ) मनों के हिसाब से तौले गए, लेकिन लोगों ने धर्म नहीं छोड़ा।” उन्होंने बताया कि धर्म का मतलब केवल पूजा या परंपराएं नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और कर्तव्य होता है। जैसे माता-पिता का अपने बच्चों के प्रति धर्म, राजा का राजधर्म, प्रजा का प्रजाधर्म, पुत्र का पितृधर्म – ये सब धर्म के ही रूप हैं।
भागवत ने कहा, “जब हालात मुश्किल हो जाते हैं, शक्ति कमजोर पड़ती है, धैर्य टूटने लगता है, तब भी जो सच्चे धर्म के मार्ग पर होते हैं, वे न थकते हैं, न रुकते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि कुछ विचारधाराएं कहती हैं कि सबको एक होना है, तो सबको एक जैसा बनना पड़ेगा। लेकिन भारत की सोच अलग है, हम मानते हैं कि विविधता में भी एकता हो सकती है। सबकी अलग पहचान और रास्ते हो सकते हैं, लेकिन सभी का लक्ष्य एक ही होता है।
भागवत ने समझाया कि भारत का धर्म- जिसे हम हिंदू धर्म कहते हैं, केवल एक धर्म नहीं, बल्कि “मानव धर्म” है। यह धर्म सिखाता है कि सभी रास्तों का आदर करो, किसी के रास्ते को बदलने की जबरदस्ती मत करो। उन्होंने कहा, “दुनिया में आज जो संघर्ष और पर्यावरण संकट हो रहा है, उसकी वजह यह है कि लोगों को मिल-जुलकर, विविधता को अपनाकर कैसे रहना है, यह नहीं पता। हमारी संस्कृति में यह ज्ञान पहले से मौजूद है।”
भागवत ने जोर देते हुए कहा कि यह पवित्र धर्म केवल हिंदुओं का नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता के लिए जरूरी है। इसे ही हम हिंदू धर्म कहते हैं, लेकिन असल में यह “मानव धर्म”, “विश्व धर्म” और “सृष्टि धर्म” है।