चंडीगढ़: डायलिसिस रोगियों की देखभाल में एक अहम उपलब्धि के रूप में पीजीआई के नैफ्रोलॉजी विभाग ने उच्च-प्रवाह एवी फिस्टुला जटिलताओं के लिए एक नई बैंडिंग तकनीक विकसित की है। यह प्रक्रिया सुरक्षित, सरल और कम खर्चीली है, जिसे डे-केयर आधार पर किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक डायलिसिस देखभाल में एक बड़ी प्रगति साबित होगी।
हाई-फ्लो फिस्टुला की चुनौती डायलिसिस मरीजों में बनाए जाने वाले फिस्टुला, धमनी और शिरा को जोड़कर तैयार किए जाते हैं। ये प्रभावी डायलिसिस के लिए जरूरी होते हैं, लेकिन जब इनमें रक्त प्रवाह अत्यधिक हो जाता है, तो हृदय पर दबाव बढ़ता है। इससे दिल की धड़कन रुकने, डायलिसिस असफल होने और फिस्टुला फटने जैसे गंभीर खतरे हो सकते हैं। अब तक इन जटिलताओं के इलाज के लिए एंजियोग्राफी, भर्ती और कैथीटेराइजेशन जैसी महंगी प्रक्रियाओं की जरूरत पड़ती थी, जिनकी लागत लगभग 50,000 रुपये तक होती थी।
इस तकनीक को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है। दिल्ली में आयोजित एक प्रमुख सम्मेलन में पीजीआई टीम ने अपने अनुभव साझा किए, जिसमें इसे व्यापक सराहना मिली। दो वर्ष पूर्व इस शोध को सर्वश्रेष्ठ शोधपत्र पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। पीजीआई टीम का लक्ष्य इस तकनीक को और परिष्कृत करना और अधिक मरीजों तक पहुँचाना है, ताकि हाई-फ्लो फिस्टुला से जूझ रहे रोगियों को बेहतर जीवन गुणवत्ता मिल सके।
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