
इस्लामाबाद : पाकिस्तान का रावलपिंडी कभी हिंदू सभ्यता का प्रमुख केंद्र था, जहां बड़ी संख्या में हिंदू रहते थे और मंदिरों व धर्मशालाओं की भरमार थी। 1947 से पहले शहर में हिंदू बहुल मोहल्ले और धार्मिक स्थल व्यापक रूप से मौजूद थे। एक पाकिस्तानी अखबार के अनुसार, 1943 की जनगणना में रावलपिंडी में 82,178 हिंदू, 47,963 सिख और केवल 22,461 मुस्लिम रहते थे। उस समय शहर में 39 मंदिर, 14 गुरुद्वारे, 12 श्मशान घाट और 11 धर्मशालाएं थीं। लेकिन 1947 के विभाजन के बाद हालात बदल गए और हिंसा व पलायन के चलते हिंदू समुदाय का बड़ा हिस्सा शहर छोड़ने को मजबूर हुआ, जिससे रावलपिंडी की हिंदू पहचान लगभग समाप्त हो गई।
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रिपोर्ट के मुताबिक, रावलपिंडी में आज सिर्फ 5,113 हिंदू रह गए हैं, जबकि पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में महज 141 हिंदू परिवार निवास करते हैं। रावलपिंडी में अब केवल तीन मंदिरों में पूजा होती है, सदर इलाके का कृष्ण मंदिर, ग्रेसी लाइन्स का वाल्मीकि मंदिर और लाल कुर्ती मंदिर। ये तीनों मंदिर 100 साल से अधिक पुराने हैं और जर्जर हालत में हैं। इसके अलावा कल्याण दास मंदिर, देवी मंदिर (कोहाटी बाजार) और पुराना किला मंदिर को पूरी तरह बंद कर दिया गया है, जहां पूजा की अनुमति नहीं है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रावलपिंडी में हिंदू समुदाय के लिए अब कोई धर्मशाला या श्मशान घाट मौजूद नहीं है।
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