Aravalli : अरावली पहाड़ों को लेकर देश की राजनीति और पर्यावरणीय बहस एक बार फिर गर्मा गई है। विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस, ने केंद्र सरकार पर अरावली क्षेत्र को खनन के लिए खोलने का आरोप लगाया है। हालांकि, इन दावों को खारिज करते हुए केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि नई व्यवस्था से अरावली को कोई खतरा नहीं है और इसका बड़ा हिस्सा पहले की तरह संरक्षित रहेगा।
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि इस पूरे मुद्दे पर भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही है। उनके मुताबिक सरकार की मंशा न तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की है और न ही अनियंत्रित खनन को बढ़ावा देने की। उन्होंने दावा किया कि अरावली का 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बढ़ी बहस
पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की एक उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों को मंजूरी दी थी। इन सिफारिशों के तहत अरावली पहाड़ियों की एक स्पष्ट और समान परिभाषा तय की गई है। नई परिभाषा के अनुसार, वही भू-भाग अरावली श्रेणी में आएंगे, जो अपने आसपास के क्षेत्र से कम से कम 100 मीटर ऊंचे हों, साथ ही उनकी ढलान और उनसे जुड़े क्षेत्र भी इसमें शामिल किए जाएंगे। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य नियमों को कमजोर करना नहीं, बल्कि पूरे देश में एकरूपता लाना है।
खनन को लेकर फैलाई जा रही गलतफहमी?
केंद्र सरकार ने यह भी साफ किया है कि यह कहना गलत है कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले सभी इलाके खनन के लिए खोल दिए जाएंगे। भूपेंद्र यादव के अनुसार, अरावली का कुल क्षेत्रफल लगभग 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र में ही खनन की पात्रता बनती है। पहाड़ियों के नीचे के इलाकों को भी संरक्षण से बाहर नहीं किया गया है, बल्कि उन्हें मौजूदा नियमों के तहत सुरक्षित रखा जाएगा।
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राज्यों में अलग-अलग नियम बने विवाद की वजह
सरकार के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप इसलिए करना पड़ा, क्योंकि अलग-अलग राज्य अरावली की अलग-अलग परिभाषा के आधार पर खनन की अनुमति दे रहे थे। जांच में सामने आया कि राजस्थान ही ऐसा राज्य है, जहां 2006 से अरावली की स्पष्ट परिभाषा लागू है। इस मॉडल में पहाड़ी के चारों ओर सबसे निचले स्तर तक पूरे क्षेत्र को संरक्षित माना जाता है। राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली ने इस मॉडल को अतिरिक्त सुरक्षा उपायों के साथ अपनाने पर सहमति जताई है।
पर्यावरण को लेकर अदालत की सख्ती बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टों पर रोक लगा रखी है, जब तक कि एक टिकाऊ और वैज्ञानिक खनन नीति तैयार नहीं हो जाती। मौजूदा खदानों को भी कड़े पर्यावरणीय नियमों के तहत ही संचालन की अनुमति है। इको-सेंसिटिव और संरक्षित क्षेत्रों में खनन पर प्रतिबंध पहले की तरह लागू रहेगा। केंद्र सरकार का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन साधने की कोशिश है, ताकि प्राकृतिक धरोहर को बचाते हुए नियमों में पारदर्शिता और एकरूपता लाई जा सके।
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