खेल डेस्क: भारतीय बैडमिंटन की सबसे बड़ी पहचान और देश को इस खेल में नई ऊंचाई तक पहुंचाने वाली खिलाड़ी साइना नेहवाल ने अपने करियर को अलविदा कह दिया है। लंबे समय से चली आ रही घुटने की गंभीर चोट और शरीर के ठीक से रिकवर न कर पाने के कारण साइना को यह मुश्किल फैसला लेना पड़ा। साइना ने अपने संन्यास का ऐलान न किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में किया, न सोशल मीडिया पर लंबा पोस्ट लिखकर, बल्कि उन्होंने यह बात एक पॉडकास्ट बातचीत के दौरान बेहद सादगी से कही।
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पॉडकास्ट में साइना ने बताया कि उनके घुटनों में ज्यादा डीजेनेरेशन हो चुका है। इस वजह से अब रोजाना कड़ी ट्रेनिंग और अंतरराष्ट्रीय स्तर की तैयारी शरीर के लिए संभव नहीं रह गई थी। साइना ने कहा, “मैंने कई महीनों तक कोशिश की कि शायद वापसी कर सकूं, लेकिन इस बार शरीर ने साफ संकेत दे दिए कि अब आगे खेल पाना मुश्किल है।”

साइना नेहवाल का करियर सिर्फ़ मेडल और ट्रॉफियों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने भारतीय बैडमिंटन की सोच और पहचान ही बदल दी। लंदन ओलंपिक 2012 में कांस्य पदक (भारत का पहला बैडमिंटन ओलंपिक मेडल) वर्ल्ड नंबर-1 रैंकिंग हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी 10 सुपर सीरीज खिताब और वर्ल्ड चैंपियनशिप में पदक।जब साइना ने ये मुकाम हासिल किए, उस दौर में भारतीय खिलाड़ियों के लिए ये सपने जैसे थे।
साइना पिछले कई महीनों से अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन से दूर थीं। उनका आखिरी टूर्नामेंट सिंगापुर ओपन 2023 रहा था। इसके बाद चोट बार-बार लौटती रही डॉक्टरों ने सर्जरी की सलाह दी और वापसी की उम्मीद धीरे-धीरे खत्म होती चली गई। इसके बावजूद साइना ने कभी बड़े मंच से संन्यास की घोषणा नहीं की। उनकी विदाई भी उन्हीं की तरह रही, शांत, गरिमामय और बिना शोर।

2012 के लंदन ओलंपिक में जीता गया कांस्य पदक सिर्फ एक मेडल नहीं था। यही वह पल था जब भारतीय बैडमिंटन ने दुनिया में अपनी मजबूत पहचान बनाई। खेल विशेषज्ञ मानते हैं “अगर पीवी सिंधु ने भारतीय बैडमिंटन को ऊंचाई पर बनाए रखा है, तो उस ऊंचाई तक पहुंचाने वाली पहली खिलाड़ी साइना नेहवाल थीं।” साइना के बाद ही पीवी सिंधु किदांबी श्रीकांत एचएस प्रणॉय जैसे खिलाड़ियों को वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास मिला।

रियो ओलंपिक 2016 से पहले लगी घुटने की चोट ने साइना के करियर को गहरा नुकसान पहुंचाया। हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी और 2017-18 में शानदार वापसी की, जिसमें शामिल रहे, कॉमनवेल्थ गेम्स गोल्ड वर्ल्ड चैंपियनशिप ब्रॉन्ज लेकिन समय के साथ घुटने ने फिर साथ छोड़ दिया। टीम इंडिया के एक पूर्व साथी खिलाड़ी ने भावुक होकर कहा, “साइना करियर खत्म नहीं करना चाहती थीं, लेकिन अब हालात ऐसे हो गए थे कि उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था।”
साइना नेहवाल का संन्यास सिर्फ एक खिलाड़ी की विदाई नहीं है, बल्कि भारतीय खेल इतिहास के एक सुनहरे अध्याय का अंत है। उन्होंने अपने खेल से इतिहास रचा, और उसी सादगी के साथ खेल को अलविदा कह दिया।
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