स्वर कोकिला और भारत रत्न लता मंगेशकर भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। हिंदी, मराठी समेत कई भाषाओं में गाए उनके गीत आज भी उनके न होने की कमी को भरने की कोशिश करते हैं। आज लता मंगेशकर की पुण्यतिथि है। बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने भोजपुरी सिनेमा को भी अपनी मधुर आवाज से समृद्ध किया था।
भोजपुरी फिल्मों में गाए उनके गीत आज भी उतने ही सजीव और असरदार हैं। भोजपुरी सिनेमा के शुरुआती दौर में लता जी की आवाज ने इस भाषा के संगीत को नई पहचान दी। उनके गीतों में भक्ति की पवित्रता, प्रेम की कोमलता और लोक संस्कृति की मिठास साफ झलकती है। ‘हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ से लेकर ‘उमरिया कइली तोहरे नाम’ तक, उनके गाए भोजपुरी गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो
यह गीत साल 1963 में आई भोजपुरी सिनेमा की पहली फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ का शीर्षक गीत है। कुंदन कुमार के निर्देशन में बनी इस फिल्म में कुमकुम, असीम कुमार और नजीर हुसैन मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। विधवा पुनर्विवाह जैसे संवेदनशील विषय पर बनी इस फिल्म में लता मंगेशकर ने गंगा मैया से प्रार्थना करते हुए गीत को इतनी भावुकता से गाया कि यह भोजपुरी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गया। संगीत चित्रगुप्त का था और बोल शैलेंद्र ने लिखे थे।
लाली लाली होठवा से बरसे ललईया
यह रोमांटिक गीत 1963 में रिलीज हुई फिल्म ‘लागी नहीं छूटे राम’ का है, जिसका निर्देशन भी कुंदन कुमार ने किया था। कुमकुम, असीम कुमार और नजीर हुसैन अभिनीत इस फिल्म में प्रेम और समर्पण की कहानी दिखाई गई थी। लता जी की मीठी और कोमल आवाज ने इस गीत को भोजपुरी प्रेम गीतों की सूची में अमर बना दिया। संगीत यहां भी चित्रगुप्त का था। यह फिल्म भोजपुरी सिनेमा की शुरुआती सुपरहिट फिल्मों में गिनी जाती है।
लुक छिप बदरा में
यह गीत भी भोजपुरी की पहली फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ से ही है। रोमांस और नटखट भावनाओं से भरे इस गीत को लता मंगेशकर की आवाज ने बेहद खूबसूरत बना दिया। चित्रगुप्त का संगीत और शैलेंद्र के बोल इस गीत को खास बनाते हैं। इस गीत ने फिल्म की सफलता में अहम भूमिका निभाई और भोजपुरी संगीत की मजबूत शुरुआत को यादगार बनाया।
उमरिया कइली तोहरे नाम
इस गीत को लता मंगेशकर के भोजपुरी करियर का पहला गीत माना जाता है। समर्पण और जीवन को किसी के नाम कर देने की भावना से भरा यह गीत आज भी उतना ही लोकप्रिय है। लता जी की भावपूर्ण गायकी इस गीत को इतना मार्मिक बना देती है कि सुनने वाला भावुक हुए बिना नहीं रह पाता। यह गीत भोजपुरी सिनेमा के शुरुआती दौर की अमूल्य धरोहर है।
लता मंगेशकर की आवाज सिर्फ गीत नहीं थी, बल्कि भावनाओं की अभिव्यक्ति थी। भोजपुरी सिनेमा में उनका योगदान भले ही सीमित रहा हो, लेकिन उसका असर आज भी गहराई से महसूस किया जाता है।