Last Updated: September 27, 2026

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साउथ सिनेमा में ‘एपिक सागा’ का जुनून, कहानी होगी तो ही चलेगा जादू

February 18, 2026

साउथ सिनेमा में ‘एपिक सागा’ का जुनून, कहानी होगी तो ही चलेगा जादू

एंटरटेनमेंट डेस्क: पिछले कुछ वर्षों में साउथ इंडस्ट्री में एक नया ट्रेंड तेज़ी से उभरा है। हर फिल्म को एपिक सागा बनाने की कोशिश। इसकी सबसे बड़ी वजह Baahubali की ऐतिहासिक सफलता बनी, जिसने यह साबित कर दिया कि अगर भव्यता, भावना और कहानी एक साथ आ जाएं तो सिनेमा इतिहास रच सकता है। वहीं दूसरी ओर Kantara जैसी कम बजट की फिल्म ने यह दिखा दिया कि बिना बड़े प्रचार और भारी-भरकम सेट के भी, सिर्फ दमदार कहानी और सांस्कृतिक जुड़ाव के दम पर दर्शकों को थिएटर तक खींचा जा सकता है।

इसी सफलता के बाद हर निर्माता और निर्देशक अपनी फिल्म को ‘एपिक’ बनाने में जुट गया। ज़्यादातर कहानियों को किसी न किसी भगवान, लोककथा या पौराणिक संदर्भ से जोड़ दिया गया। सोच अच्छी थी, लेकिन परेशानी तब शुरू हुई जब कहानी से ज़्यादा भरोसा प्रचार और शोर पर किया जाने लगा। हाल के समय में Jattadhara, Kannappa, Odela 2 और Mirai जैसी फिल्मों का खूब ढोल पीटा गया। ट्रेलर आए, बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर ये फिल्में कब आईं और कब गईं, किसी को ठीक से पता नहीं चला। वजह साफ थी कहानी में वो पकड़ नहीं थी, जो दर्शकों को बांध सके।

भगवान का नाम जोड़ देने से फिल्म गहरी नहीं हो जाती और भव्य दृश्य डाल देने से भावनाएं पैदा नहीं होतीं। इसी कड़ी में अब एक और फिल्म Naagbhandhan चर्चा में है। इस फिल्म को भी आध्यात्मिक और पौराणिक पृष्ठभूमि में पेश किया जा रहा है और इसे अगला बड़ा एपिक सागा बनाने की तैयारी की जा रही है। इसके पोस्टर और झलकियों में भव्यता जरूर दिखती है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी, जब इसकी कहानी दर्शकों के दिल से जुड़ेगी। आज का दर्शक सिर्फ नाग, देवता या रहस्य देखकर खुश नहीं होता, वह यह देखना चाहता है कि फिल्म उसे अंदर तक महसूस करा पा रही है या नहीं। इसके उलट, जब हम Kantara 2 की बात करते हैं, तो वहां शोर कम और असर ज्यादा दिखाई देता है। क्योंकि यहां कहानी और आस्था एक-दूसरे में घुल जाती हैं। जब दर्शक को लगता है कि यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि उसकी मिट्टी, उसकी परंपरा और उसके विश्वास की कहानी है, तभी असली जादू पैदा होता है।

आज की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि भगवान को कहानी का हिस्सा बनाइए, लेकिन कहानी को भगवान के सहारे मत चलाइए। विजुअल्स ज़रूरी हैं, लेकिन भावनाओं से ज़्यादा ज़रूरी नहीं। प्रचार अहम है, लेकिन कंटेंट के बिना प्रचार खोखला साबित होता है। दर्शक अब पहले से कहीं ज़्यादा समझदार हो चुका है। वह सिर्फ पोस्टर और ट्रेलर देखकर टिकट नहीं खरीदता, बल्कि यह देखता है कि फिल्म उसे कुछ महसूस करा पा रही है या नहीं। कांतारा जैसी फिल्में इसलिए चलती हैं क्योंकि वहां भक्ति और कथा एक-दूसरे में घुल जाती हैं, जबकि बाकी फिल्मों में भगवान सिर्फ नाम के लिए होते हैं और कहानी कमज़ोर पड़ जाती है।

एपिक सागा बनाने के लिए बड़ा बजट नहीं, बल्कि बड़ी सोच और सच्ची कहानी चाहिए। जब कहानी और आस्था एक साथ चलेंगी, तभी सिनेमा में वो जादू पैदा होगा, जो दर्शकों को थिएटर तक खींच लाएगा। वरना शोर बहुत होगा, लेकिन असर शून्य।

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