नई दिल्ली: नवरात्रि पर्व में जौ का विशेष महत्व होता है। श्रद्धालु इस दौरान जौ बोते हैं और इसे देवी दुर्गा की कृपा का प्रतीक मानते हैं। माना जाता है कि जौ के रंग और आकार से आने वाले समय की सुख-समृद्धि, उपलब्धि और कठिनाइयों के बारे में संकेत मिलते हैं।
विशेषकर यदि जौ हरे और घने उगते हैं तो इसका अर्थ है कि घर में कोई कमी नहीं रहेगी। सफेद जौ बड़ी उपलब्धियों का संकेत देता है। वहीं यदि जौ मुरझाए हुए या कम उगते हैं तो यह आने वाले समय में चुनौतियों की ओर इशारा करता है।
नवरात्रि समापन के बाद जौ का क्या करें?
नवरात्रि के दसवें दिन, यानी दशमी के दिन, सुबह स्नान के बाद देवी दुर्गा की पूजा विधिपूर्वक करें। पूजा के दौरान कलश और जौ को भी दीपक दिखाएं और देवी से हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
इसके बाद जौ को सम्मानपूर्वक उठाकर विसर्जित किया जाना चाहिए। यदि आपके घर के पास नदी या तालाब है तो वहां विसर्जन करना शुभ माना जाता है। यदि ऐसा स्थान न हो तो आप जौ को पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे रख सकते हैं। इसके अलावा जौ को घर के गमले की मिट्टी में मिला कर खाद बनाने का विकल्प भी अपनाया जा सकता है।
कुछ परंपराओं में घर के पुरुष सदस्य और बच्चे जौ के कुछ तिनके अपने कान के पीछे रखते हैं। ऐसा करने से अच्छे स्वास्थ्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। वहीं, हरे जौ के तिनकों को लाल कपड़े में लपेटकर घर की तिजोरी या धन रखने वाले स्थान पर रखने से साल भर बरकत बनी रहती है।
विसर्जन का सही समय
विशेष रूप से ध्यान दें कि जौ का विसर्जन दशमी तिथि रहते हुए ही करें। 28 मार्च 2026 की सुबह 8 बजकर 45 मिनट तक इसे विसर्जित करना शुभ माना गया है। इसके बाद एकादशी लग जाएगी और परंपरा के अनुसार जौ विसर्जन का समय समाप्त हो जाएगा।
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जौ को लेकर ये भूल न करें
कभी भी जौ को कूड़ेदान में नहीं फेंकना चाहिए। यदि आपको नदी, तालाब या पेड़ का विकल्प उपलब्ध नहीं है, तो घर के गमले या बगीचे की मिट्टी में इसे दबा देना सबसे सुरक्षित और पारंपरिक तरीका है। नवरात्रि के दौरान बोया गया जौ केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि यह घर में समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली का संदेश भी लेकर आता है। इसलिए इसके सही तरीके से विसर्जन को हमेशा प्राथमिकता दें।
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