Last Updated: October 1, 2026

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फैसलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सभी हाईकोर्ट को तीन महीने में निर्णय सुनाने का निर्देश

May 29, 2026

फैसलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सभी हाईकोर्ट को तीन महीने में निर्णय सुनाने का निर्देश

नई दिल्लीः देशभर की अदालतों में मामलों के फैसले आने में हो रही देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और अहम कदम उठाया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने हाईकोर्ट और निचली अदालतों के लिए कई जरूरी और बाध्यकारी निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने साफ कहा कि लोगों को समय पर न्याय देना न्यायपालिका की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और फैसलों को लंबे समय तक रोककर रखना बिल्कुल स्वीकार नहीं किया जा सकता।

तीन महीने के भीतर फैसला सुनाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि सभी हाईकोर्ट लंबित मामलों में अधिकतम तीन महीने के भीतर फैसला सुनाएं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस दिन फैसले का मुख्य हिस्सा सुनाया जाएगा, उसी दिन को फैसले की आधिकारिक तारीख माना जाएगा। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट देश की प्रमुख न्यायिक संस्थाएं हैं, जहां लाखों लोग न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। ऐसे में समय पर निर्णय देना जरूरी है ताकि लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा बना रहे।

जमानत मामलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर जमानत मामलों में हो रही देरी पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि जमानत से जुड़े आदेश उसी दिन या ज्यादा से ज्यादा अगले दिन तक जारी किए जाने चाहिए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि निचली अदालतें जमानत आदेश की जानकारी तुरंत जेल प्रशासन और संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाएं, ताकि कैदियों की रिहाई में किसी तरह की अनावश्यक देरी न हो।

जमानत मिलने के बाद उसी दिन रिहाई पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन कैदियों को जमानत मिल चुकी है, उन्हें जरूरी कानूनी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद उसी दिन रिहा किया जाना चाहिए। अदालत ने माना कि कई बार जमानत मिलने के बावजूद तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से कैदियों को अतिरिक्त समय जेल में रहना पड़ता है, जो उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

24 घंटे के भीतर वेबसाइट पर अपलोड होंगे फैसले
पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि अदालतों के फैसले सुनाए जाने के 24 घंटे के भीतर संबंधित हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किए जाएं। इससे पक्षकारों और वकीलों को समय पर आदेश की कॉपी मिल सकेगी और अनावश्यक परेशानी नहीं होगी।

किसी जज पर सवाल उठाने के लिए नहीं दिए गए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ये निर्देश किसी जज या न्यायिक संस्था पर सवाल उठाने के उद्देश्य से नहीं दिए गए हैं। अदालत ने कहा कि देशभर में बढ़ते लंबित मामलों और फैसलों में हो रही देरी को देखते हुए एक समान व्यवस्था बनाना जरूरी हो गया था।

झारखंड हाईकोर्ट के मामले की सुनवाई के दौरान आया आदेश
जानकारी के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश झारखंड हाईकोर्ट में फैसले सुनाने में हुई देरी से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया। सुनवाई के समय अदालत ने कहा कि न्याय में अनावश्यक देरी लोगों के न्यायपालिका पर भरोसे को कमजोर करती है और इस समस्या को जल्द खत्म करना समय की जरूरत है।

समय पर न्याय देना सबसे जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में दोहराया कि “न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है।” अदालत ने कहा कि अगर लोगों को समय पर फैसले नहीं मिलेंगे तो न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होगी। इसलिए सभी अदालतों को तय समय सीमा के भीतर मामलों का निपटारा करना चाहिए।

 

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