
देहरादून। उत्तराखंड में कांग्रेस ने चुनावी बिगुल तो फूंक दिया है, लेकिन अब उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती इस माहौल को संगठनात्मक ताकत में बदलने की है। राहुल गांधी के दौरे ने कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने का काम किया है, वहीं नई प्रदेश कार्यकारिणी के गठन की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। कांग्रेस की नजर अब हाईकमान की मंजूरी पर टिकी है, क्योंकि आगामी रणनीति की दिशा काफी हद तक नए संगठनात्मक ढांचे से तय होगी।
सात माह पहले कांग्रेस हाईकमान ने उत्तराखंड कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर पूर्व विधायक गणेश गोदियाल की ताजपोशी तो की, लेकिन उनकी प्रांतीय टीम को अनुमोदन नहीं मिल पाया। यही कारण है कि उत्तराखंड में वो मजबूती नहीं मिल पाई, जिसकी अपेक्षा की जा रही थी। दरअसल, प्रदेश कांग्रेस के भीतर सबसे बड़ी कसरत आंतरिक गुटबाजी को थामने और कद्दावर नेताओं को साधने की है। इसके साथ ही क्षेत्रीय संतुलन के साथ ही सामाजिक समीकरणों को भी बारीकी से तौलना होगा। इस जद्दोजहद में सात माह का समय गुजर चुका है, लेकिन प्रदेश कांग्रेस की टीम घोषित नहीं हो पाई है। वह भी तब जबकि, प्रदेश अध्यक्ष अपनी टीम के नाम हाईकमान को भेज चुके हैं।
इस परिदृश्य में राज्य में वर्ष 2017 से अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही कांग्रेस की चुनावी तैयारियों को भी झटका लग रहा हैै। यद्यपि, राहुल गांधी के दौरे के मद्देनजर उत्तराखंड आईं कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने कहा था कि राहुल के दौरे के बाद प्रदेश कार्यकारिणी घोषित कर दी जाएगी। अब जबकि राहुल गांधी का दौरान निबट चुका है तो प्रदेश कार्यकारिणी कब तक घोषित होगी, यह प्रश्न सबकी जुबां पर है। राजनीतिक गलियारों में यह प्रश्न भी तैर रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष बिना टीम के राज्य में चुनावी गाड़ी को कितना आगे तक खींच पाएंगे।
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