इंटरनेशनल डेस्क: “चाइना शॉक 2.0” आजकल पश्चिमी देशों में खूब इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है। इसके जरिए यह तर्क दिया जाता है कि चीन की इलेक्ट्रिक गाड़ियां, बैटरियां, सोलर पैनल और उन्नत औद्योगिक उत्पाद दुनिया के बाजार में बहुत सस्ते दाम पर आ रहे हैं और इससे दूसरे देशों की उद्योग व्यवस्था और नौकरियों को खतरा पैदा हो रहा है।
यह तर्क नया नहीं है। 1980 के दशक में जापान के बारे में भी लगभग यही बातें कही गई थीं। तब भी कहा गया था कि सरकारी मदद, सस्ती कीमतें और आक्रामक औद्योगिक नीति के कारण जापान दुनिया के उद्योगों को नुकसान पहुंचा रहा है। कुछ चिंताएं सही थीं, लेकिन बाद में कई आशंकाएं गलत साबित हुईं। असली सवाल हमेशा यह होता है कि क्या कोई देश अनुचित तरीके से आगे बढ़ रहा है या वह तकनीक, उत्पादन क्षमता और बेहतर व्यवस्था के कारण प्रतिस्पर्धी बन गया है।
“चाइना शॉक 2.0” की बहस काफी हद तक 2013 में प्रकाशित एक अमेरिकी अध्ययन पर आधारित है। उस अध्ययन में कहा गया था कि 2001 से 2010 के बीच अमेरिका में चीनी आयात बढ़ने से कुछ क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ी। लेकिन उस निष्कर्ष को अक्सर जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। अध्ययन का मतलब यह नहीं था कि चीन के साथ व्यापार पूरी तरह नुकसानदेह है, बल्कि यह था कि कुछ स्थानीय उद्योगों और श्रमिकों पर असर पड़ा।
आज की स्थिति पहले से अलग है। अब मामला केवल सस्ते खिलौनों या कपड़ों का नहीं है। चर्चा उन क्षेत्रों की हो रही है जो आधुनिक तकनीक, हरित ऊर्जा और जटिल औद्योगिक उत्पादन से जुड़े हैं। दुनिया को स्वच्छ ऊर्जा की ओर ले जाने में सस्ती बैटरियों, सोलर पैनलों और इलेक्ट्रिक वाहनों की बड़ी भूमिका है।
इलेक्ट्रिक वाहनों का उदाहरण सबसे महत्वपूर्ण है। आम धारणा यह है कि चीनी कंपनियां केवल सरकारी सब्सिडी की वजह से सस्ती गाड़ियां बेच पा रही हैं। लेकिन शोध संस्थान रोडियम ग्रुप की रिपोर्ट कुछ और कहानी बताती है। उसके अनुसार चीनी कंपनी BYD को प्रति वाहन लगभग 4,700 डॉलर की लागत बढ़त हासिल है, जबकि प्रत्यक्ष सरकारी सब्सिडी इसमें केवल लगभग 292 डॉलर की भूमिका निभाती है।
असल ताकत चीन की उत्पादन व्यवस्था में छिपी है। BYD अपने ज्यादातर पुर्जे खुद बनाती है। इससे सप्लायर पर निर्भरता कम होती है और लागत घटती है। साथ ही, शोध, डिजाइन और प्रशासनिक खर्च भी कम पड़ते हैं। यानी चीन की बढ़त सिर्फ सस्ती मजदूरी से नहीं, बल्कि तेज उत्पादन, मजबूत सप्लाई चेन, बड़े पैमाने पर निर्माण और तकनीकी दक्षता से आ रही है।
दरअसल अब चीन की औद्योगिक सफलता को केवल “सस्ते श्रम” से समझना मुश्किल है। चीन में मजदूरी लगातार बढ़ी है, लेकिन इसके बावजूद उसके निर्यात उत्पादों की कीमतें स्थिर रही हैं या घटी हैं। इसका मतलब साफ है कि वहां उत्पादकता, ऑटोमेशन और तकनीकी क्षमता तेजी से बढ़ी है।
पिछले दो दशकों में चीन ने अनुसंधान और विकास यानी R&D पर भारी निवेश किया है। चीन अब दुनिया की प्रमुख नवाचार अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। यही कारण है कि वह केवल बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि नई तकनीकों का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
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स पूरी बहस का दूसरा पक्ष भी है। चीनी उत्पादों की कम कीमतें कई देशों और उपभोक्ताओं के लिए फायदेमंद साबित हुई हैं। सस्ते सोलर पैनल और बैटरियों ने स्वच्छ ऊर्जा को अधिक सुलभ बनाया है। इससे विकासशील देशों को ऊर्जा परिवर्तन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने का मौका मिला है।
अगर चीन सचमुच केवल दुनिया को “झटका” दे रहा होता, तो दूसरे विकासशील देश उससे दूरी बना रहे होते। लेकिन हकीकत उलटी है। दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों, वियतनाम और मेक्सिको जैसे देशों की औद्योगिक वृद्धि चीन की सप्लाई चेन से गहराई से जुड़ी हुई है।
आज वैश्विक उत्पादन व्यवस्था इतनी जुड़ी हुई है कि किसी एक देश पर लगाया गया शुल्क कई दूसरे देशों को भी प्रभावित करता है। चीन से निर्यात होने वाले उत्पादों में जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, आसियान देशों और कई पश्चिमी कंपनियों की तकनीक और पुर्जे भी शामिल होते हैं।
इसलिए “चाइना शॉक 2.0” को केवल खतरे की कहानी के रूप में देखना अधूरा नजरिया हो सकता है। असली चुनौती यह है कि दूसरे देश अपनी औद्योगिक क्षमता, तकनीकी शोध और उत्पादन व्यवस्था को कितना मजबूत बना पाते हैं।
सवाल यह नहीं है कि चीन सस्ते और उन्नत उत्पाद क्यों बना रहा है। बड़ा सवाल यह है कि बाकी दुनिया ऐसी उत्पादन व्यवस्था कैसे तैयार करे, जो आधुनिक तकनीक को आम लोगों के लिए सुलभ और किफायती बना सके।
(अखिल पाराशर, CGTN हिन्दी संवाददाता, पेइचिंग)
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