
शिमला: केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला में “जलवायु अनुकूलता, खाद्य सुरक्षा एवं सतत कृषि के लिए अगली पीढ़ी की पादप स्वास्थ्य रणनीतियाँ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। इस संगोष्ठी का आयोजन इंडियन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसायटी (आईपीएस) के तत्वावधान में इंडियन पोटैटो एसोसिएशन, इंडियन सोसायटी ऑफ प्लांट पैथोलॉजिस्ट्स, हिमालयन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसायटी तथा आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), क्षेत्रीय केंद्र, शिमला के संयुक्त सहयोग से किया जा रहा है। संगोष्ठी का उद्घाटन मुख्य अतिथि डॉ. एस. एस. चहल, पूर्व कुलपति, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. स्वरूप कुमार चक्रवर्ती, पूर्व कुलपति, उत्तर बंग कृषि विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल की गरिमामयी उपस्थिति में दीप प्रज्वलित कर किया गया।
उद्घाटन समारोह में डॉ. ब्रजेश सिंह, निदेशक, सीपीआरआई, शिमला एवं अध्यक्ष, इंडियन पोटैटो एसोसिएशन; डॉ. आर. विश्वनाथन, अध्यक्ष, इंडियन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसायटी; डॉ. अनिल हांडा, अध्यक्ष, हिमालयन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसायटी; डॉ. एस. सी. भारद्वाज, अध्यक्ष, इंडियन सोसायटी ऑफ प्लांट पैथोलॉजिस्ट्स; डॉ. संजीव शर्मा, संयोजक, राष्ट्रीय संगोष्ठी-2026; डॉ. धर्मपाल, अध्यक्ष, आईसीएआर-आईएआरआई, क्षेत्रीय केंद्र, शिमला तथा डॉ. संतोष वाटपड़े, वरिष्ठ वैज्ञानिक सहित अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक उपस्थित रहे।
मुख्य अतिथि डॉ. एस. एस. चहल ने अपने संबोधन में जलवायु परिवर्तन, बढ़ते अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा बदलती कृषि उत्पादन प्रणालियों के परिप्रेक्ष्य में उभरते एवं आक्रामक कीटों और रोगों से भारतीय कृषि की सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने पादप जैव-सुरक्षा व्यवस्था में संरचनात्मक एवं तकनीकी कमियों, अंतरराष्ट्रीय प्रवेश स्थलों पर अपर्याप्त जांच, देश में प्रवेश के बाद कमजोर पादप संगरोध निगरानी तथा कृषि आयात से जुड़ी चुनौतियों पर चिंता व्यक्त की।
उन्होंने कहा कि कृषि उत्पादन में होने वाली क्षति को कम करने और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पारंपरिक पादप संरक्षण उपायों के साथ उन्नत निगरानी प्रणालियों, आधुनिक रोग निदान तकनीकों तथा विभिन्न संस्थानों के बीच प्रभावी समन्वय को बढ़ावा देना आवश्यक है। पादप रोगों की पहचान एवं प्रबंधन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-एआई) की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करते हुए डॉ. चहल ने कहा कि वास्तविक खेत परिस्थितियों में विश्वसनीय एआई आधारित समाधान विकसित करने के लिए व्यापक एवं गुणवत्तापूर्ण आंकड़ों, बहुविषयक विशेषज्ञता तथा अनुसंधान संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि सीमित आंकड़ों, कुछ विशेष फसलों एवं रोगजनकों तक सीमित तकनीकी अनुप्रयोगों तथा तकनीकी बाधाओं के कारण एआई आधारित पादप स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों का व्यापक उपयोग अभी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। उन्होंने कृषि उत्पादकता बढ़ाने के साथ पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन सुनिश्चित करने वाली तकनीकों के विकास पर भी विशेष जोर दिया।
संगोष्ठी के प्रथम पूर्ण सत्र की अध्यक्षता डॉ. एस. एस. चहल ने की, जबकि सह-अध्यक्षता अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (इक्रीसैट), पटनचेरु की डॉ. ममता शर्मा ने की। इस सत्र में प्रतिष्ठित डॉ. टी. एस. थिंड विशिष्ट पादप रोग वैज्ञानिक पुरस्कार व्याख्यान के साथ विभिन्न विशेषज्ञों के मुख्य व्याख्यान आयोजित किए गए। डॉ. स्वरूप कुमार चक्रवर्ती ने “पुनर्योजी कृषि में पादप रोग प्रबंधन: भारत के लिए एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण” विषय पर मुख्य व्याख्यान देते हुए टिकाऊ रोग प्रबंधन के लिए पादप, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को एकीकृत करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
डॉ. आर. विश्वनाथन, पूर्व निदेशक, आईसीएआर-भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ एवं अध्यक्ष, इंडियन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसायटी ने “रोग प्रतिरोधी फसलों के विकास में जीनोम संपादन: प्रगति, अवसर एवं भविष्य की संभावनाएं” विषय पर व्याख्यान देते हुए फसलों में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। इसी क्रम में डॉ. वी. पी. शर्मा, पूर्व निदेशक, आईसीएआर-मशरूम अनुसंधान निदेशालय, सोलन ने “मशरूम: अप्रयुक्त संपदा, विकास, पोषण एवं भविष्य की संभावनाएं” विषय पर मुख्य व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने पोषण सुरक्षा, आजीविका विविधीकरण तथा सतत कृषि में मशरूम उत्पादन की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।
दो दिवसीय संगोष्ठी के दौरान उभरते पादप रोगों, नवीन रोग प्रबंधन तकनीकों, जलवायु अनुकूल कृषि, उन्नत रोग निदान प्रौद्योगिकियों तथा टिकाऊ फसल उत्पादन प्रणालियों से संबंधित विभिन्न तकनीकी सत्रों एवं आमंत्रित व्याख्यानों का आयोजन किया जा रहा है। पादप रोग विज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्ट शैक्षणिक एवं अनुसंधान योगदान को सम्मानित करने के लिए एम. जे. नरसिम्हन अकादमिक पुरस्कार, इनसॉप पुरस्कार, डॉ. एस. एस. कांग पीएच.डी. शोध प्रबंध पुरस्कार तथा डॉ. एस. एस. चहल सर्वश्रेष्ठ स्नातकोत्तर शोध प्रबंध पुरस्कार प्रदान किए जाने का कार्यक्रम भी निर्धारित है।
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के 17 राज्यों से 250 से अधिक वैज्ञानिक, शिक्षाविद्, शोधकर्ता एवं विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। यह आयोजन वैज्ञानिक उपलब्धियों एवं नवीन अनुसंधान परिणामों के आदान-प्रदान, बहुविषयक अनुसंधान सहयोग को सुदृढ़ करने तथा जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए नवीन पादप स्वास्थ्य रणनीतियों के विकास का महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मंच प्रदान कर रहा है। संगोष्ठी से प्राप्त वैज्ञानिक विचार-विमर्श एवं सुझाव देश में जलवायु अनुकूल कृषि, खाद्य सुरक्षा और सतत कृषि विकास को नई दिशा देने में सहायक होंगे।
📍 Location: शिमला (शिमला)
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