आज के समय में गर्मी से राहत पाने के लिए लोग एसी और कूलर पर निर्भर हैं लेकिन एक समय ऐसा भी था जब न बिजली थी और न ही आधुनिक मशीनें। इसके बावजूद राजा-महाराजा अपने महलों को इतना ठंडा रखते थे कि भीषण गर्मी में भी अंदर का माहौल सुकून भरा रहता था। यह सब संभव था उनकी समझदारी भरी वास्तुकला और प्राकृतिक तरीकों की वजह से।
महलों की बनावट ही करती थी ठंडक का काम
पुराने समय के महल सिर्फ रहने की जगह नहीं होते थे बल्कि उन्हें मौसम के हिसाब से डिजाइन किया जाता था। दीवारें बहुत मोटी बनाई जाती थीं जिससे बाहर की तेज गर्मी अंदर तक आसानी से नहीं पहुंच पाती थी। पत्थर और चूने से बनी ये दीवारें दिनभर गर्मी को सोखकर धीरे-धीरे छोड़ती थीं जिससे अंदर का तापमान संतुलित बना रहता था।
राजस्थान के सिटी पैलेस जैसे महलों में आज भी यह फर्क साफ महसूस किया जा सकता है जहां बाहर की गर्मी के मुकाबले अंदर ठंडक बनी रहती है।
हवा के लिए खास रास्ते बनाए जाते थे
महलों में हवा के आने-जाने का खास ध्यान रखा जाता था। बड़ी-बड़ी खिड़कियां ऊंची छतें और झरोखे इस तरह बनाए जाते थे कि हवा लगातार चलती रहे। हवा महल इसका सबसे अच्छा उदाहरण है जिसे इस तरह डिजाइन किया गया था कि हर समय हवा का प्रवाह बना रहे। इससे गर्म हवा बाहर निकलती थी और ठंडी हवा अंदर आती रहती थी जिससे बिना किसी मशीन के ही कूलिंग का असर मिलता था।
ये भी पढ़ें : https://dainiksaveratimes.com/ajab-gajab/a-girl-booked-a-bike-ride-for-just-250-meters/
पानी का इस्तेमाल
महलों में जगह-जगह फव्वारे, छोटे तालाब और पानी के कुंड बनाए जाते थे। जब पानी धीरे-धीरे उड़ता यानी वाष्पित होता था तो आसपास की हवा ठंडी हो जाती थी। यह एक प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम की तरह काम करता था। गर्मियों में इन फव्वारों के पास बैठना ठंडी हवा का अहसास देता था जो आज के कूलर जैसा ही अनुभव देता था।
खस की टट्टी से बनती थी ठंडी हवा
दरवाजों और खिड़कियों पर खस की टट्टियां लगाई जाती थीं। इन पर बार-बार पानी डाला जाता था और जब हवा इनसे होकर गुजरती थी तो वह ठंडी हो जाती थी। यह तरीका आज भी कई जगह देसी कूलर के रूप में इस्तेमाल होता है लेकिन उस समय यह महलों का एक जरूरी हिस्सा हुआ करता था।
तहखाने गर्मी से बचने का सबसे बड़ा सहारा
महलों में नीचे की तरफ बने तहखाने गर्मियों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते थे। जमीन के नीचे होने की वजह से इनका तापमान स्वाभाविक रूप से ठंडा रहता था। दिल्ली के लाल क़िला (Red Fort) जैसे ऐतिहासिक स्थलों में भी ऐसे ठंडे कक्ष बनाए गए थे जहां शाही परिवार गर्मी के समय आराम करता था।
रंग और सामग्री का भी था खास महत्व
महलों की दीवारों और छतों पर हल्के रंगों का इस्तेमाल किया जाता था ताकि सूरज की किरणें वापस परावर्तित हो जाएं और गर्मी कम अंदर आए। इसके अलावा निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी प्राकृतिक होती थी, जैसे पत्थर, मिट्टी और चूना, जो गर्मी को कम अवशोषित करते हैं।
खुला आंगन और हरियाली भी देती थी राहत
महलों में बड़े-बड़े आंगन और बगीचे बनाए जाते थे। खुले स्थानों से हवा का प्रवाह बना रहता था और पेड़-पौधे आसपास के तापमान को कम करने में मदद करते थे। इस तरह महलों के अंदर एक प्राकृतिक और ठंडा माहौल तैयार हो जाता था।
राजाओं के समय में तकनीक भले ही सीमित थी लेकिन उनकी सोच और वास्तुकला इतनी उन्नत थी कि वे बिना एसी के भी महलों को ठंडा रख पाते थे।
मेष: दिन शुभ रहेगा...