अजब-गजब: दुनिया में कई देशों की संपन्नता तेल, गैस, सोना या बड़े उद्योगों पर आधारित है, लेकिन एक ऐसा देश भी है जिसने पक्षियों की बीट से अरबों डॉलर की संपत्ति कमाई। यह कहानी प्रशांत महासागर में स्थित छोटे से द्वीपीय देश नाउरू की है, जो कभी दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाता था। हालांकि समय के साथ गलत आर्थिक फैसलों और प्राकृतिक संसाधनों के खत्म होने के कारण यह देश गंभीर आर्थिक संकट में फंस गया।
कैसे अमीर बना नाउरू?
नाउरू की आर्थिक सफलता का सबसे बड़ा आधार फॉस्फेट नामक खनिज था। यह खनिज लाखों वर्षों तक समुद्री पक्षियों की बीट जमा होने से बना था। प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में इस द्वीप पर आते थे और उनकी बीट की मोटी परतें धीरे-धीरे जमीन पर जमा होती गईं। लंबे समय तक चली प्राकृतिक और रासायनिक प्रक्रियाओं ने इन्हें उच्च गुणवत्ता वाले फॉस्फेट में बदल दिया। दुनिया के कई विशेषज्ञों का मानना था कि नाउरू में मौजूद फॉस्फेट दुनिया के सबसे शुद्ध और बेहतरीन फॉस्फेट भंडारों में से एक था।
फॉस्फेट की इतनी ज्यादा मांग क्यों थी?
फॉस्फेट का उपयोग मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र में खाद बनाने के लिए किया जाता है। यह फसलों की पैदावार बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अन्य कृषि प्रधान देशों को बड़ी मात्रा में फॉस्फेट की जरूरत थी, जैसे-जैसे दुनिया में खाद की मांग बढ़ती गई, नाउरू के फॉस्फेट की कीमत और मांग भी बढ़ती चली गई। इससे इस छोटे से देश को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा मिलने लगी और उसकी अर्थव्यवस्था तेजी से मजबूत होती गई।
आजादी के बाद आई खुशहाली
वर्ष 1968 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद नाउरू ने फॉस्फेट उद्योग का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। इसके बाद खनिज निर्यात से होने वाली पूरी कमाई देश के खजाने में आने लगी। इस आय के दम पर सरकार ने नागरिकों को कई सुविधाएं उपलब्ध कराईं। लोगों को मुफ्त शिक्षा, मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं और अन्य सरकारी लाभ दिए गए। देश में टैक्स का बोझ भी बहुत कम था। उस समय नाउरू के नागरिकों का जीवन स्तर दुनिया के सबसे विकसित देशों के बराबर माना जाता था। 1970 के दशक में नाउरू की प्रति व्यक्ति आय दुनिया में सबसे अधिक आय वाले देशों में शामिल थी। उस दौर में यह देश आर्थिक समृद्धि का प्रतीक बन गया था।
फिर खत्म होने लगे खजाने के भंडार
नाउरू की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि उसकी अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह एक ही संसाधन पर निर्भर थी। फॉस्फेट का भंडार सीमित था और लगातार खनन के कारण यह तेजी से घट रहा था। 1990 के दशक तक द्वीप के अधिकांश फॉस्फेट भंडार समाप्त होने लगे। उत्पादन में गिरावट आने के साथ ही देश की आय भी कम होती गई, जिस संसाधन ने नाउरू को अमीर बनाया था, वही धीरे-धीरे खत्म हो गया।
विदेशों में निवेश भी नहीं आया काम
फॉस्फेट से मिली भारी कमाई को भविष्य के लिए सुरक्षित करने के बजाय देश ने विदेशों में कई बड़े निवेश किए। होटल, हवाई जहाज, रियल एस्टेट और अन्य व्यवसायों में अरबों डॉलर लगाए गए, लेकिन इनमें से कई परियोजनाएं सफल नहीं हो सकीं। कुछ निवेशों में भारी नुकसान हुआ, जबकि कई योजनाएं पूरी तरह विफल साबित हुईं। नतीजतन देश की जमा पूंजी तेजी से खत्म होने लगी और आर्थिक स्थिति कमजोर होती चली गई।
आज क्या है नाउरू की स्थिति?
प्राकृतिक संसाधनों के खत्म होने और असफल निवेशों के कारण नाउरू को गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। एक समय दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में गिने जाने वाला यह छोटा द्वीप बाद में विदेशी सहायता और बाहरी आर्थिक सहयोग पर काफी हद तक निर्भर हो गया। नाउरू की कहानी दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण सबक मानी जाती है। यह दिखाती है कि केवल प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाली संपत्ति लंबे समय तक समृद्धि की गारंटी नहीं देती। संसाधनों का सही प्रबंधन, विविध आर्थिक विकास और दूरदर्शी निवेश किसी भी देश के स्थायी विकास के लिए बेहद जरूरी होते हैं।
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