अजब-गजब: जापान में यात्रियों को ले जाने वाली एक अनोखी फेरी तैयार की गई है, जो अपने आप चल सकती है। इस फेरी का नाम ‘ओलंपिया ड्रीम सेतो’ है। इसे जापान के शिन-ओकायामा पोर्ट से कागावा प्रांत के टोनोशो पोर्ट के बीच चलाने की योजना है। जापान की नॉन-प्रॉफिट संस्था निप्पॉन फाउंडेशन के मुताबिक, यह फेरी 11 दिसंबर से सेमी-ऑटोनॉमस सिस्टम यानी आंशिक रूप से खुद चलने वाली तकनीक के साथ काम करना शुरू कर देगी।
दरअसल, जापान इस समय एक बड़ी सामाजिक समस्या से जूझ रहा है। देश की आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है और कामकाजी लोगों की संख्या लगातार घट रही है। इसका असर समुद्री परिवहन पर भी साफ दिख रहा है। आंकड़ों के अनुसार, तटीय शिपिंग में काम करने वाले आधे से ज्यादा क्रू मेंबर की उम्र 50 साल से ऊपर है। आने वाले समय में फेरी और जहाज चलाने के लिए अनुभवी लोगों की भारी कमी हो सकती है।
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जापान में कई छोटे-छोटे द्वीप हैं, जहां रहने वाले लोग रोजाना फेरियों पर निर्भर रहते हैं। इन्हीं फेरियों के जरिए उनका संपर्क होन्शू, होक्काइडो, क्यूशू और शिकोकू जैसे बड़े द्वीपों से बना रहता है। निप्पॉन फाउंडेशन का कहना है कि अगर क्रू की कमी और बढ़ी, तो दूर-दराज के द्वीपों के लिए फेरी सेवाएं घटानी पड़ सकती हैं। इससे वहां रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और जरूरतों पर बुरा असर पड़ेगा।
इसी समस्या के समाधान के तौर पर ऑटोनॉमस नेविगेशन तकनीक को आगे बढ़ाया जा रहा है। निप्पॉन फाउंडेशन का दावा है कि तटीय शिपिंग के लिए पूरी तरह खुद चलने वाले जहाजों की दिशा में जापान दुनिया के सबसे आगे है। संस्था का मानना है कि इस तकनीक से न केवल शिपिंग सेक्टर को मजबूती मिलेगी, बल्कि लॉजिस्टिक्स, अर्थव्यवस्था और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में भी नए अवसर पैदा होंगे।
खास बात यह है कि कई छोटे द्वीपों में चलने वाली फेरियों पर स्थानीय लोग ही क्रू के रूप में काम करते हैं। अगर ऐसे लोगों की संख्या कम हुई, तो फेरी सेवाएं बंद होने का खतरा भी बढ़ सकता है। ऐसे में ऑटोनॉमस सिस्टम इन द्वीपों के लिए बड़ी राहत बन सकता है।
निप्पॉन फाउंडेशन के एक्जीक्यूटिव मित्सुयुकी उन्नो के अनुसार, ओलंपिया ड्रीम सेतो फेरी अगले साल मार्च के अंत तक पूरी तरह ऑटोनॉमस सिस्टम के साथ कमर्शियल ऑपरेशन में आ सकती है। फिलहाल इस फेरी को चरणबद्ध तरीके से चलाया जाएगा, ताकि हर तरह की समुद्री स्थिति में इसकी तकनीक की जांच की जा सके। हालांकि, समुद्र में खुद चलने वाले जहाजों को चलाना आसान नहीं है। जमीन पर चलने वाली सेल्फ-ड्राइविंग कारों की तुलना में समुद्र में टेलीकॉम नेटवर्क कमजोर होता है। इसके अलावा, जहाजों के लिए बाधाओं को पहचानने और उनसे बचने वाली तकनीक भी अभी पूरी तरह विकसित नहीं है। इसके बावजूद IoT, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इमेज एनालिसिस जैसे क्षेत्रों में जापान की मजबूत पकड़ को देखते हुए विशेषज्ञों को उम्मीद है कि यह देश इस चुनौती को भी पार कर लेगा।
इस प्रोजेक्ट के शुरुआती चरण में साल 2020 से 2022 के बीच टोक्यो बे समेत कई इलाकों में छह जहाजों पर परीक्षण किए गए थे। इन सफल परीक्षणों के बाद अब यात्रियों को ले जाने वाली फेरी में इस तकनीक को लागू किया जा रहा है, जो समुद्री परिवहन के भविष्य की एक नई झलक पेश करता है।
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