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बहुविवाह की छूट का दुरुपयोग न करें… इलाहाबाद HC की मुस्लिम मर्दों को लेकर अहम टिप्पणी

नेशनल डेस्क :  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुस्लिम पुरुषों को बहुविवाह (एक से अधिक विवाह) की अनुमति को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस्लाम में दी गई यह छूट बिना शर्त नहीं है। मुस्लिम पुरुष तभी दूसरी शादी कर सकता है, जब वह सभी पत्नियों के साथ समानता और निष्पक्षता से व्यवहार करने में सक्षम हो। कोर्ट का मानना है कि यह प्रावधान किसी भी प्रकार से स्वार्थपूर्ति का साधन नहीं बनना चाहिए। आइए जानते है इस खबर को विस्तार से…

मुरादाबाद से जुड़ा है फैसला

आपको बता दें कि यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले से जुड़े एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई। इस केस में फुरकान नामक व्यक्ति और दो अन्य ने ट्रायल कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ जारी की गई चार्जशीट और समन को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इन पर बलात्कार (धारा 376), पहली शादी छिपाकर दूसरी शादी करने (धारा 495), आपराधिक साजिश (धारा 120-B), गाली-गलौज (धारा 504) और धमकी देने (धारा 506) के तहत केस दर्ज था।

बचाव पक्ष का तर्क और शरीयत का हवाला

वहीं फुरकान की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि पीड़िता ने खुद स्वीकार किया है कि संबंध बनने के बाद विवाह हुआ, और चूंकि शरीयत अधिनियम 1937 के अनुसार मुस्लिम पुरुष को चार विवाह की अनुमति है, इसलिए यह कोई अपराध नहीं बनता। उन्होंने कहा कि यह धार्मिक कानून के दायरे में आता है।

राज्य सरकार ने किया विरोध

राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि अगर पहला विवाह मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत नहीं हुआ है, या किसी ने धर्म परिवर्तन के बाद विवाह किया है, तो ऐसे विवाह भारतीय दंड संहिता की धारा 494 (पहले विवाह के रहते दूसरा विवाह करना) के तहत अवैध और दंडनीय माने जाएंगे। इस तर्क को हाईकोर्ट ने इस विशेष मामले में खारिज कर दिया।

 शरीयत के अनुसार वैध… पर सीमाएं जरूरी

18 पन्नों के विस्तृत आदेश में हाईकोर्ट ने माना कि दोनों विवाह मुस्लिम महिलाओं से हुए हैं और दोनों ही इस्लाम धर्म को मानने वाली हैं, इसलिए ये विवाह शरीयत के अनुसार वैध हैं। साथ ही कोर्ट ने कहा कि इस मामले में धारा 376, 495 और 120-B लागू नहीं होतीं। कोर्ट ने इस अवसर पर कुरान का संदर्भ देते हुए कहा कि बहुविवाह की अनुमति का उद्देश्य सामाजिक ज़रूरतें थीं – जैसे विधवा या अनाथ महिलाओं की देखभाल। इसे स्वार्थ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

दुरुपयोग से सावधान रहने की चेतावनी

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम पुरुष इस छूट का दुरुपयोग न करें। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति समान व्यवहार करने की योग्यता नहीं रखता, तो दूसरी शादी करना नैतिक और धार्मिक रूप से उचित नहीं होगा।

फिलहाल दंडात्मक कार्रवाई पर रोक

कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 26 मई 2025 से शुरू होने वाले सप्ताह में करने की बात कही है। साथ ही कोर्ट ने तब तक याचिकाकर्ताओं के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है।

धार्मिक कानून के तहत अधिकार, लेकिन जिम्मेदारी भी

इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों के साथ सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी होती हैं। बहुविवाह की छूट मूल्य आधारित है, अधिकार आधारित नहीं, और इसका दुरुपयोग कानून और धर्म दोनों के विपरीत माना जाएगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला मौलिक अधिकारों और व्यक्तिगत आचरण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है।

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