नई दिल्ली: भारतीय न्यायपालिका में समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा की एक मिसाल पेश करते हुए सुप्रीम कोर्ट के तीसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस अभय श्रीनिवास ओका ने जीवन के सबसे व्यक्तिगत क्षणों में भी अपने दायित्वों को पहले रखा। अपनी मां वसंती ओका के निधन के बाद, उनके अंतिम संस्कार के बाद कुछ ही घंटो में दिल्ली लौटकर 11 अहम मामलों में फैसला सुनाने का निर्णय लिया है।
गौरतलब है कि जस्टिस ओका 25 मई को उच्चतम न्यायालय से रिटायर होने जा रहे हैं। रिटायरमेंट से महज एक दिन पहले, जब कई न्यायाधीश परंपरागत रूप से कार्यभार से विराम लेते हैं, तब जस्टिस ओका ने इसे चुनौती देते हुए न्याय की अंतिम घड़ी तक सक्रिय रहने का संकल्प दिखाया है।
-अंतिम संस्कार के कुछ घंटे बाद लौटे सुप्रीम कोर्ट
21 मई को एक सम्मान समारोह के बाद, उन्हें अपनी मां के निधन की सूचना मिली। अंतिम संस्कार 23 मई को महाराष्ट्र के ठाणे स्थित उनके पुश्तैनी निवास पर संपन्न हुआ। मां को अंतिम विदाई देने के कुछ ही घंटे बाद जस्टिस ओका दिल्ली के लिए रवाना हो गए, यह जताते हुए कि देश की न्याय प्रणाली में उनकी सेवा का आखिरी दिन भी अर्थपूर्ण होना चाहिए।
-“मुझे ‘रिटायर’ शब्द पसंद नहीं”
SCOARA (Supreme Court Advocates-on-Record Association) द्वारा आयोजित विदाई समारोह में जस्टिस ओका ने स्पष्ट रूप से कहा, “मुझे रिटायर शब्द से नफरत है।” उन्होंने आगे कहा, “यह परंपरा रही है कि न्यायाधीश अंतिम दिन कोई काम न करें, लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूं। मेरा विश्वास है कि न्यायिक दायित्व अंतिम क्षण तक निभाए जाने चाहिए।”
-एक प्रेरणा, एक विरासत
जस्टिस अभय ओका न केवल अपने न्यायिक फैसलों के लिए बल्कि अपने मूल्यों, समर्पण और दृढ़ता के लिए भी याद रखे जाएंगे। यह घटना दर्शाती है कि न्यायपालिका में सेवा एक पेशा नहीं, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी है, जिसे अंतिम सांस तक निभाया जा सकता है।
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