
नई दिल्ली : अर्थशास्त्रियों ने लगातार दूसरी बार रेपो रेट में बढ़ौतरी के अपने रुख को बरकरार रखा, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की अक्तूबर बैठक के मिनट्स से केंद्रीय बैंक का रुख पहले की तुलना में अधिक सख्त (हॉकिश) दिखाई दिया है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि बढ़ती महंगाई और रुपए पर बने दबाव को देखते हुए दिसंबर में भी रेपो रेट में 50 बेसिस प्वाइंट तक की बढ़ौतरी की जा सकती है।
एसबीआई की रिपोर्ट में कहा कि दिसंबर की मौद्रिक नीति बैठक में 50 बेसिस प्वाइंट की अतिरिक्त बढ़ौतरी की संभावना बनी हुई है। ये बढ़ौतरी या तो सीधे रेपो रेट में 50 बेसिस प्वाइंट की वृद्धि के रूप में हो सकती है या फिर 25 बेसिस प्वाइंट रेपो रेट बढ़ाने और 25 बेसिस प्वाइंट के असमान समायोजन के जरिए लिक्विडिटी एडजस्टमैंट फैसिलिटी (एलएएफ) कॉरिडोर को चौड़ा किया जा सकता है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर डॉ. सौम्य कांति घोष ने कहा कि महंगाई का दबाव व्यापक होता जा रहा है और रुपए में कमजोरी भी बनी हुई है।
ऐसे में आरबीआई को स्थिति पर करीबी नजर रखने और संतुलित नीतिगत कदम उठाने की आवश्यकता है। डीबीएस बैंक की वरिष्ठ अर्थशास्त्री और कार्यकारी निदेशक राधिका राव ने कहा कि अक्तूबर नीति बैठक के मिनट्स से यह स्पष्ट हुआ है कि आरबीआई ने सख्त रुख अपनाया है। बैठक में रेपो रेट 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ाया गया और नीति रुख को ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ में बदला गया। उन्होंने कहा कि समिति के सदस्यों ने बढ़ते महंगाई दबाव और मजबूत आर्थिक वृद्धि को ब्याज दर बढ़ाने के प्रमुख कारणों के रूप में देखा।
कुछ बाहरी सदस्यों ने महंगाई जोखिमों के विस्तार को रेखांकित करते हुए पहले से कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया, जबकि कुछ अन्य सदस्य क्रमिक बढ़ौतरी के पक्ष में रहे और लंबे समय तक कड़ी मौद्रिक नीति के संकेत देने के खिलाफ दिखे। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि देश के सबसे बड़े इक्विटी आईपीओ में विदेशी निवेश प्रवाह ने भी रुपए को समर्थन दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, फिलहाल रुपया बाहरी घटनाक्रमों पर सीमित प्रतिक्रिया दिखा रहा है, लेकिन कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण बॉन्ड बाजार पर दबाव बना रह सकता है।
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