नई दिल्ली: ईरान पर हालिया इज़रायल और अमेरिकी हमलों के बाद वैश्विक ऊर्जा संकट की चर्चा जोरों पर है, लेकिन इसका असर अब फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री पर भी दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में पैराबैटामोल और अन्य जरूरी दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी संभव है।
कच्चे माल की बढ़ी कीमतें
भारत में दवा निर्माण के लिए जरूरी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स (API) की कीमतों में पिछले दो हफ्तों में लगभग 30% तक वृद्धि हुई है। इससे देश की फार्मा इंडस्ट्री पर दबाव बढ़ गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस वृद्धि का मुख्य कारण ईरान युद्ध के बाद वैश्विक शिपिंग नेटवर्क में पैदा हुई बाधाएं हैं। कंटेनर जहाजों की कमी के कारण चीन से भारत आने वाले कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित हो रही है। चीन भारत की दवा कंपनियों के लिए API का सबसे बड़ा स्रोत है।
इसके साथ ही शिपिंग लागत भी तेजी से बढ़ी है। पहले 4,000 डॉलर तक आने वाले अतिरिक्त सरचार्ज अब 8,000 डॉलर तक पहुंच गए हैं।
उत्पादन लागत पर असर
इकॉनमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, फार्मा कंपनियां अब बढ़ी हुई कच्चे माल की कीमतों का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डालने लगी हैं। API और फार्मास्युटिकल सॉल्वेंट्स की कीमतें 20-30% तक बढ़ गई हैं। विशेषज्ञ मेहुल शाह का कहना है कि सॉल्वेंट्स पेट्रोकेमिकल्स से बनते हैं और मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के कारण तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हुई है, जिससे दवा निर्माण की लागत पर दबाव बढ़ा है।
कुछ प्रमुख कच्चे माल की कीमतों में हालिया उछाल इस प्रकार है:
ग्लिसरीन: दिसंबर के मुकाबले 64% तक महंगी
पैराबैटामोल: लगभग 26% तक वृद्धि
इंडस्ट्री मांग रही है मूल्य वृद्धि की छूट
फार्मा उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ईरान संघर्ष लंबा चलता है तो दवाओं की कीमतों में और वृद्धि की संभावना है। फेडरेशन ऑफ फार्मा एंटरप्रेन्योर्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष हरीश जैन ने कहा कि वर्तमान मूल्य नियंत्रण व्यवस्था में इतनी बढ़ोतरी को कंपनियां अपने स्तर पर संभाल नहीं सकतीं, इसलिए नेशनल फार्मा प्राइसिंग अथॉरिटी को दवाओं की कीमतों में सीमित बढ़ोतरी की अनुमति देनी चाहिए।
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शिपिंग संकट से दवाओं की उपलब्धता भी प्रभावित
पूर्व फार्मास्युटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष दिनेश दुआ का कहना है कि शिपिंग रूट प्रभावित होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ रही है। अगर स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो जरूरी दवाओं की उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है।
अधिकांश फार्मा कंपनियां “जस्ट-इन-टाइम” इन्वेंट्री मॉडल अपनाती हैं, यानी वे बड़े स्टॉक नहीं रखतीं। अगर युद्ध अगले 10–15 दिनों तक चलता है तो कच्चे माल की सप्लाई में देरी कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।