Hukamnama 8 March 2026: टोडी महला ५ ॥ साधसंगि हरि हरि नामु चितारा ॥ सहजि अनंदु होवै दिनु राती अंकुरु भलो हमारा ॥ रहाउ ॥ गुरु पूरा भेटिओ बडभागी जा को अंतु न पारावारा ॥ करु गहि काढि लीओ जनु अपुना बिखु सागर संसारा ॥१॥ जनम मरन काटे गुर बचनी बहुड़ि न संकट दुआरा ॥ नानक सरनि गही सुआमी की पुनह पुनह नमसकारा ॥२॥९॥२८॥ {पन्ना 717}
पद्अर्थ: साध संगि = गुरू की संगति में। सहजि = आत्मिक अडोलता के कारण। अंकुरु = (पिछले बीजे हुए कर्मों के) फल। रहाउ।
भेटिओ = मिल गए। बड भागी = बड़ी किस्मत से। जा को = जिस (परमात्मा) का। पारावारा = पार अवार, परला उरला छोर। करु = (एकवचन) हाथ। गहि = पकड़ के। जनु अपुना = अपने सेवक को। बिखु = जहर, आत्मिक जीवन को समाप्त करने वाली माया के मोह का जहर।1।
गुर बचनी = गुरू के वचनों से। संकट दुआरा = कष्टों (वाले चौरासी के चक्करों) का दरवाजा। गही = पकड़ी। पुनह पुनह = बार बार।2।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य गुरू की संगति में टिक के परमात्मा का नाम सिमरता रहता है (उसके अंदर आत्मिक अडोलता पैदा हो जाती है, उस) आत्मिक अडोलता के कारण (उसके अंदर) दिन रात (हर वक्त) आनंद बना रहता है। (हे भाई! साध-संगति की बरकति से) हम जीवों के पिछले किए कर्मों के भले अंकुर फूट पड़ते हैं। रहाउ।
हे भाई! जिस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता, जिसकी हस्ती का इस पार उस पार का छोर नहीं मिल सकता, वह परमात्मा अपने उस सेवक को (उसका) हाथ पकड़ के संसार समुंद्र से बाहर निकाल लेता है, (जिस सेवक को) बड़ी किस्मत से पूरा गुरू मिल जाता है।1।
हे भाई! गुरू के बचनों पर चलने से जनम-मरण में डालने वाली फाहियां कट जाती हैं, कष्टों भरे चौरासी के चक्करों का दरवाजा दोबारा नहीं देखना पड़ता। हे नानक! (कह– हे भाई! गुरू की संगति की बरकति से) मैंने भी मालिक-प्रभू का आसरा लिया है, मैं (उसके दर पर) बार बार सिर निवाता हूँ।2।9।27।
मेष: दिन शुभ रहेगा...