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Putrada Ekadashi 2026: कब खुलेगा श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत? यहां जानें पारण का सही समय और विधि

Putrada Ekadashi 2026

Putrada Ekadashi 2026

Putrada Ekadashi 2026: श्रावण मास की पुत्रदा एकादशी को हिंदू धर्म में भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस वर्ष तिथि के अंतर के कारण गृहस्थ और वैष्णव परंपरा में यह व्रत अलग-अलग दिनों में रखा जा रहा है। ऐसे में व्रत रखने वालों के लिए पारण का सही समय जानना बेहद जरूरी है।

24 अगस्त को व्रत रखने वालों के लिए पारण कब?

जिन लोगों ने 23 अगस्त 2026 को श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा है, वे 24 अगस्त को पारण कर सकते हैं। पंचांग के अनुसार, पारण का समय दोपहर 1:41 बजे से शाम 4:16 बजे तक बताया गया है।

पारण वाले दिन हरिवासर की समाप्ति सुबह 10:49 बजे होगी। इसलिए व्रत खोलते समय तिथि और निर्धारित पारण काल का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है।

25 अगस्त को कब खोलें व्रत?

वैष्णव परंपरा के अनुसार जिन श्रद्धालुओं ने 24 अगस्त को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा है, उनके लिए पारण 25 अगस्त 2026 को होगा। इस दिन व्रत खोलने का समय सुबह 5:55 बजे से 6:20 बजे तक रहेगा।

बताया गया है कि द्वादशी तिथि 25 अगस्त को सुबह 6:20 बजे समाप्त होगी। इसलिए इस निर्धारित अवधि में पारण करना शुभ माना जाता है।

एकादशी व्रत का पारण कैसे करें?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद और हरिवासर समाप्त होने के पश्चात करना चाहिए। पारण से पहले सुबह स्नान कर भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें।

पूजा के दौरान भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करना विशेष माना जाता है। इसके बाद अपनी क्षमता के अनुसार ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराकर दान-दक्षिणा दी जा सकती है।

सात्विक भोजन से खोलें व्रत

पूजा और दान के बाद भगवान विष्णु को अर्पित तुलसी दल तथा चरणामृत ग्रहण करके व्रत खोलने की परंपरा है। इसके बाद सात्विक भोजन करना चाहिए। पारण के दौरान भारी या तामसिक भोजन से बचने की सलाह धार्मिक परंपराओं में दी जाती है।

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पुत्रदा एकादशी का क्या है महत्व?

धार्मिक मान्यताओं में श्रावण पुत्रदा एकादशी को मनोकामना पूर्ति और संतान सुख से जोड़कर देखा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु को ‘पवित्रा’ अर्पित करने की परंपरा भी है। पवित्रा सूती धागों से बनी एक धार्मिक डोरी होती है, जिसे कई श्रद्धालु पूजा स्थल पर सुरक्षित रखते हैं।

ध्यान रहे कि ऊपर बताए गए समय और विधियां धार्मिक पंचांग एवं मान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग स्थानों के पंचांग में समय में मामूली अंतर संभव है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।

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