मुंबई (फरीद शेख) : फ़िल्म बहुत कुछ कहने की कोशिश करती है। एक विवाहेतर संबंध, एक पिता जो एक आदर्श पितृसत्तात्मक व्यक्ति है और कई ऐसे पुरुष जो प्रगतिशील नागरिक बनने से इनकार करते हैं का एक लंबा-चौड़ा औचित्य या यूँ कहें कि महिमामंडन है।
‘आप जैसा कोई’ अपनी ही फिल्म है और श्रीरेणु त्रिपाठी और मधु बोस के इर्द-गिर्द घूमती है। श्रीरेणु, जिन्हें प्यार से ‘श्री’ कहा जाता है, जमशेदपुर के एक स्थानीय स्कूल में संस्कृत के शिक्षक हैं। वह 42 साल के कुंवारे हैं जो मानते हैं कि वह अपनी सहपाठी राखी द्वारा दिए गए श्राप का दंश झेल रहे हैं, जब उन्होंने उसे प्रपोज़ किया था। श्रीरेणु के जीवन में कन्या का प्रवेश हो ही नहीं पा रहा। किसी लड़की को उनका नाम पसंद नहीं आता, तो किसी को उनका काम। ऐसे में, उनका बचपन का दोस्त दीपक (नमित दास) उनकी मुलाकात डेटिंग ऐप ‘आप जैसा कोई’ से करवा देता है।
इस ऐप के जरिए श्रीरेणु एक कन्या से मीठी-मीठी बातें करते हैं, जिससे उनके उदासी भरे चेहरे पर मुस्कान तैरने लगती है। मगर चमत्कार तो तब होता है, जब कोलकाता की हसीन-जहीन मधु बोस (फातिमा सना शेख) उनकी जिंदगी में आती है। इधर, श्रीरेणु की शादी होने वाली है। उसे खुद यकीन नहीं होता कि पियानो बजाने वाली, फ्रेंच पढ़ाने वाली मधु से उनका विवाह होगा। हालांकि, दोनों के परिवारों के बीच रहन-सहन और सोच में काफी अंतर है। श्रीरेणु का भाई अपनी पत्नी और बेटी के सपनों को जहां ढेलाभर भी महत्व नहीं देता, वहीं मधु के परिवार में औरतों-पुरुषों के साथ बैठकर शराब की चुस्कियां तक लेती हैं। सोच का यही अंतर श्रीरेणु और मधु के रिश्ते में भी दरार की वजह बनता।
इसे कहानी में स्वाभाविक रूप से पिरोया जाना चाहिए, बिना किसी दबाव के। ‘आप जैसा कोई’ में, जब चीज़ें ख़ुशनुमा होती हैं, तो वे लगभग अतिशयोक्तिपूर्ण लगती हैं – लेकिन जब दरारें दिखाई देती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे सब कुछ अचानक कहीं से टूटकर गिर पड़ा हो। यह कहकर कि वह उसे सबकुछ अलाऊ करेगा, पर लिमिट में! लेकिन मधु पलटकर पूछ लेती है- तुम क्यों तय करोगे मेरी लिमिट? अब यह प्रेम कहानी किस मुकाम पर पहुंचती है? यह जानने के लिए फिल्म देखनी होगी।
निर्देशक विवेक सोनी ने फिल्म को बहुत खूबसूरती से लोगो के सामने लाया है और आर माधवन, फातिमा सना शेख मुख्य भूमिका में हैं। और जब परफॉर्मेंस की बात करें तो आर. माधवन और फातिमा सना शेख की बेहतरीन परफॉर्मेंस आपको ‘प्यार की खुशबू का अनुभव’ कराती है। फ़िल्म बहुत कुछ देखने की कोशिश करती है। एक विवाहेतर संबंध, एक पिता जो एक आदर्श पितृसत्तात्मक व्यक्ति है, और कई ऐसे पुरुष जो प्रगतिशील नागरिक बन गए हैं, उन्हें अस्वीकार करते हैं, “फिल्म में ये लाइन बहुत परफेक्ट तारीख से सामने लाई है” तुम क्यों तय करोगे मेरी लिमिट।
ये आज की नारी हिम्मत और उसका कॉन्फिडेंस दिखती है माना पड़ेगा विवेक सोनी की सोच के लिए दैनिक सवेरा टाइम्स न्यूज़ मीडिया नेटवर्क इस फिल्म को 4 स्टार रेटिंग देता है।
मेष: दिन शुभ रहेगा...