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Hrishikesh Mukherjee: ‘गोलमाल’ की मस्ती से ‘आनंद’ की भावुकता तक, हर रंग को पर्दे पर उतारने में माहिर थे ऋषिकेश दा

Hrishikesh Mukherjee

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Hrishikesh Mukherjee: 27 अगस्त सिर्फ कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की पुण्यतिथि है, जिसने हिंदी सिनेमा को न सिर्फ एक अलग नजरिए से देखा, बल्कि दर्शकों को भी दिखाया। हम बात कर रहे हैं ऋषिकेश मुखर्जी की, जिन्हें प्यार से लोग ऋषि दा कहते थे। 27 अगस्त 2006 को वह इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनकी फिल्में आज भी लोगों के जेहन में जिंदा हैं।

उनकी फिल्मों को देखते हुए ऐसा लगता है, जैसे पर्दे पर कोई फिल्म नहीं, बल्कि हमारे ही घर-परिवार और आसपास की जिंदगी चल रही हो।

ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्में बड़े-बड़े सेट, महंगे कपड़ों और जबरदस्त एक्शन के लिए नहीं, आम इंसान की कहानी को दर्शाने के लिए जानी जाती हैं। मध्यमवर्गीय परिवार, छोटी-छोटी खुशियां, रिश्तों की उलझन, दोस्ती, प्यार, उम्मीद और जिंदगी के उतार-चढ़ाव, इन सबको उन्होंने इतने सहज अंदाज में पर्दे पर उतारा कि दर्शक किरदारों में खुद को खोजने लगते थे।

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30 सितंबर 1922 को कोलकाता में जन्मे ऋषिकेश मुखर्जी ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से केमिस्ट्री की पढ़ाई की। कुछ समय तक उन्होंने पढ़ाने का काम भी किया, लेकिन उनका मन फिल्मों की दुनिया में था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत फिल्म एडिटर के तौर पर की। न्यू थिएटर्स में काम करने के बाद उन्हें निर्देशक बिमल रॉय के साथ काम करने का मौका मिला।

1957 में उन्होंने बतौर निर्देशक ‘मुसाफिर’ से शुरुआत की। फिल्म उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं रही। इसके बाद 1959 में आई ‘अनाड़ी’ ने उन्हें पहचान दिलाई। इसके बाद तो उन्होंने हिंदी सिनेमा को ‘बावर्ची’, ‘चुपके-चुपके’, ‘गुड्डी’ और ‘अभिमान’ जैसी एक से बढ़कर एक यादगार फिल्में दीं। वहीं, ‘गोलमाल’ आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे पसंदीदा कॉमेडी फिल्मों में गिनी जाती है।

ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन का एक दिलचस्प पहलू उनका शतरंज प्रेम भी था। कहा जाता है कि शूटिंग के दौरान वह कई बार सेट पर शतरंज खेलते नजर आते थे। देखने वालों को लगता कि निर्देशक शूटिंग छोड़कर खेल में व्यस्त हैं, लेकिन ऋषि दा की नजर हर चीज पर होती थी। शतरंज की तरह ही वह फिल्म के हर किरदार और हर सीन की चाल पहले से सोचकर चलते थे।

अपने योगदान के लिए ऋषिकेश मुखर्जी को दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण जैसे बड़े सम्मानों से नवाजा गया। उन्होंने चार दशकों से ज्यादा लंबे करियर में 42 फिल्मों का निर्देशन किया।

27 अगस्त 2006 को ऋषि दा ने आखिरी सांस ली, लेकिन उनका सिनेमा आज भी जिंदा है। ‘आनंद’ की संवेदना हो या ‘गोलमाल’ की शरारत, ‘चुपके-चुपके’ की हंसी हो या ‘अभिमान’ के रिश्तों की कसक, ऋषि दा ने हर रंग को अपने अंदाज में पर्दे पर उतारा।

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