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Movie Review: ‘मन्नू क्या करेगा’ एक अहसास… जिसमें शायद आप खुद को देख लें, यह सिर्फ फिल्म नहीं, एक आईना है

एंटरटेनमेंट डेस्क (फरीद शेख): डायरेक्टर संजय त्रिपाठी लेकर आते हैं “मन्नू क्या करेगा?”।’ ऐसी फिल्म है, जो गहरे मैसेज और खूबसूरत एहसासों के साथ आपको एक मुस्कान दे जाती है. शरद मेहरा की ओर से निर्मित और संजय त्रिपाठी की ओर से निर्देशित यह कहानी कहीं बनावटी नहीं लगती. रोमांस, दोस्ती और हल्की-फुल्की नोक-झोंक से सजी यह फिल्म आज की जनरेशन की असलियत को बड़े सहज अंदाज में सामने रखती है।

देहरादून की पृष्ठभूमि पर आधारित इस फिल्म की कहानी मानव चतुर्वेदी उर्फ मन्नू की है, जो कॉलेज में पढ़ने वाला एक खुशमिजाज, बिंदास और दोस्तों के बीच लोकप्रिय लड़का है, लेकिन जिंदगी की सही दिशा को लेकर उलझन में रहता है. उसे समझ नहीं आता कि आगे क्या करना है, किस रास्ते पर बढ़ना है और यही अधूरापन उसकी जिंदगी को खालीपन देता है. तभी उसकी मुलाकात होती है जिया से-एक बेफिक्र, आजाद ख्यालों वाली और जिंदादिल लड़की, जिसकी दोस्ती और फिर मोहब्बत मन्नू को खुद को पहचानने और अपनी राह ढूंढने की हिम्मत देती है.

व्योम यादव ने मन्नू को केवल निभाया नहीं है, बल्कि जीया है। उनकी मासूम नज़रें, हिचकिचाहट भरी मुस्कान और अपनापन लिए हर हावभाव दर्शकों को यह यकीन दिलाते हैं कि मन्नू कोई काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि हमारे बीच का ही कोई लड़का है। व्योम यादव अपने पहले ही प्रयास में प्रभावित करते हैं। उन्होंने मन्नू के किरदार को इतनी ईमानदारी और सहजता से निभाया है कि दर्शक उनके दर्द और मासूमियत से तुरंत जुड़ जाते हैं। उनकी आँखों में बसी उलझनें और बॉडी लैंग्वेज की सहजता मन्नू को बेहद जीवंत बना देती है।

साची बिंद्रा ने अपने डेब्यू में जिया के किरदार को गहराई और नज़ाकत से जिया है। जिया का आत्मविश्वास, उसकी बेपरवाह आज़ादी और भीतर छिपा सेंसिटिव पहलू साची ने इन सभी लेयर्स को बारीकी से परदे पर उतारा है। विनय पाठक भले ही सीमित स्क्रीन टाइम में नज़र आते हैं, लेकिन उनका किरदार दर्शकों के दिल पर गहरी छाप छोड़ जाता है। वहीं, कुमुद मिश्रा, राजेश कुमार, चारु शंकर और बृजेंद्र काला जैसे अनुभवी कलाकारों ने अपने-अपने रोल्स को इतनी सहजता से निभाया है कि फिल्म की कहानी और भी जीवंत हो उठती है।

मन्नू क्या करेगा”  एक अहसास, जिसमें शायद आप खुद को देख लें।यह सिर्फ फिल्म नहीं, एक आईना है

क्यूरियस ऑय फिल्म्स का यह प्रोजेक्ट बेहद सधा हुआ है। डायरेक्टर ने कहानी को तेज़ या ड्रामाई बनाने की बजाय धीमी रफ्तार में ही परोसा है, ताकि दर्शक हर पल को महसूस कर सकें। लंबे शॉट्स और साइलेंस फिल्म का मूड और गहरा करते हैं।

फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट इसकी ईमानदारी और सादगी है। यह आपको सोचने पर मजबूर करती है।यह व्यावसायिक मनोरंजन नहीं, बल्कि एक अनुभव है। “इस फ़िल्म को दैनिक सवेरा टाइम्स न्यूज़ मीडिया नेटवर्क ने 4.0 स्टार्स दिए हैं।”

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