
एंटरटेनमेंट डेस्क: दो दशकों से भी ज़्यादा समय से संजय मेमाने मराठी और हिंदी कहानी कहने की दुनिया में एक अहम विज़ुअल आवाज़ रहे हैं। वे एक ऐसे सिनेमैटोग्राफ़र हैं, जिनकी तस्वीरें गाँव के सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों और प्राइम-टाइम टेलीविज़न से लेकर ऑस्कर की चर्चाओं, यूरोपीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल की जूरी और दुनिया भर के स्ट्रीमिंग दर्शकों के घरों तक पहुँची हैं। आज वे सिर्फ़ एक उभरती हुई प्रतिभा के तौर पर नहीं, बल्कि एक जाने-माने कोच और मेंटर के तौर पर जाने जाते हैं। उनकी कला और सेट पर उनकी लीडरशिप ने भारतीय सिनेमैटोग्राफ़रों की पूरी एक पीढ़ी के काम के अंदाज़ और अनुशासन को आकार दिया है।

मेमाने की अंतरराष्ट्रीय पहचान उनके करियर की शुरुआत में ही ‘श्वास’ फ़िल्म से बननी शुरू हो गई थी। यह एक कम बजट वाली मराठी फ़ीचर फ़िल्म थी, जो 77वें ऑस्कर अवॉर्ड्स में ‘बेस्ट फ़ॉरेन लैंग्वेज फ़िल्म’ कैटेगरी के लिए भारत की तरफ़ से आधिकारिक एंट्री बनी और इस कैटेगरी में चुनी जाने वाली यह पहली मराठी फ़िल्म थी। इस फ़िल्म ने न सिर्फ़ ‘बेस्ट फ़ीचर फ़िल्म’ का नेशनल फ़िल्म अवॉर्ड और महाराष्ट्र स्टेट फ़िल्म अवॉर्ड जीता, बल्कि इसे मराठी सिनेमा को फिर से ज़िंदा करने वाला एक अहम मोड़ भी माना गया। बाद में यह फ़िल्म हिंदी, बंगाली और तमिल भाषाओं में भी रिलीज़ हुई, जिससे मेमाने की विज़ुअल शैली की पहुँच भाषाई सीमाओं के पार तक फैल गई। पुणे, सिंधुदुर्ग, कोंकण क्षेत्र और KEM अस्पताल जैसी जगहों पर एक महीने से कुछ ज़्यादा समय में शूट की गई ‘श्वास’ ने मेमाने की उस काबिलियत को साबित किया कि वे बेहद व्यस्त शेड्यूल के बावजूद भी भावनाओं से भरी और एकदम स्वाभाविक दिखने वाली विज़ुअल तैयार कर सकते हैं। यह वही अनुशासन है, जो अब उनके ट्रेनिंग का एक अहम हिस्सा बन चुका है और जिसे वे आज की युवा फ़िल्म क्रू को सिखाते हैं।

मेष: दिन शुभ रहेगा...