Shatak Movie Review(फरीद शेख): भारत तेज़ सोच और लगातार बदलती रायों का देश है। हर कोने में चर्चा होती है, हर मुद्दे पर लोग अपनी-अपनी कहानी गढ़ते हैं। ऐसे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का नाम भी हमेशा सामने आता है, कभी तारीफ में, कभी बहस में। सौ साल पहले की शुरूआत आज की दुनिया पर अपनी छाप छोड़ती है। ‘शतक’ इस फर्क और कनेक्शन को परदे पर लाती है। यह फिल्म केवल घटनाओं को दोहराने की कोशिश नहीं करती, बल्कि दिखाती है कि कैसे एक छोटा-सा विचार समय के साथ बड़ा बनता गया।
फिल्म की खूबसूरती उसकी सादगी में है। ज्यादा शोर-शराबा नहीं, बस छोटे-छोटे पल और कुछ खास चेहरे। ठीक उसी तरह से शतक की कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, जल्दीबाज़ी नहीं दिखती। हर सीन में ऐसा लगता है जैसे हम सीधे उस मौके पर मौजूद हैं, जैसे हर बात और हर अहसास असली हो। कैमरा, आवाज़ और माहौल मिलकर इसे और सच्चा बना देते हैं। साथ ही आशीष मॉल का डायरेक्शन इसे खूबसूरती से आकर देता है।
फिल्म में डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार को किसी नायक की तरह चमकते हुए नहीं दिखाया गया। वे सरल, शांत और सोच-समझ वाले इंसान के रूप में दिखाई देते हैं, और उनकी यही सादगी उनकी असली ताकत बनती है। जैसे ही कहानी माधव सदाशिव गोलवलकर के समय तक पहुँचती है, माहौल का रंग बदल जाता है। आज़ादी के बाद के समय की कठिनाइयाँ, पाबंदियाँ और असुरक्षित माहौल बिना किसी ज़ोर-शोर के सामने आते हैं, फिर भी उनका असर गहरा महसूस होता है। इस तरह की संतुलित कहानी और प्रस्तुति हर घटना को और प्रभावशाली बना देती है।

फिल्म उन कहानियों में भी घुसती है जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। चाहे दादरा और नगर हवेली हो या कश्मीर, यह दिखाती है कि बड़े फैसले हमेशा शोर-शराबे और भीड़ के बीच नहीं लिए जाते। कई काम धीरे-धीरे, चुपचाप किए जाते हैं, लेकिन उनका असर लंबा और गहरा होता है। इन हिस्सों में भावनाओं की गहराई साफ़ दिखती है। जब युवा अपने घर छोड़ते हैं और पीछे परिवार की आंखों में चिंता और उम्मीद झलकती है, तो कहानी सिर्फ इतिहास नहीं बनती। यह त्याग, डर और आशा की कहानी भी बन जाती है, जो फिल्म को हर दर्शक के करीब ले आती है।
इस फिल्म की खासियत इसकी राइटिंग है। नितिन सावंत, रोहित गहलोत और उत्सव दान ने कहानी को सीधा और साफ रखा है। अनिल धनपत अग्रवाल का कॉन्सेप्ट पूरे सफर पर ध्यान देता है, जहां एक विचार धीरे-धीरे आकार लेता है। आशीष मॉल के निर्देशन ने ओवरड्रामा से बचते हुए हर सीन में भावनाओं को महसूस कराना आसान बनाया, और प्रोड्यूसर वीर कपूर ने फिल्म की क्वालिटी और स्केल को मजबूत किया। यही संतुलित अंदाज इसे ज्यादा प्रभावशाली बनाता है।
अंत में, कृधान मीडियाटेक के बैनर तले बनी यह फिल्म सिर्फ घटनाओं का विवरण नहीं है। यह धैर्य, सोच और लगातार प्रयास की कहानी भी बयां करती है। फिल्म खत्म होने के बाद भी यह असर लंबे समय तक महसूस होते हैं। ऐसे में अगर इस वीकेंड आप कुछ इतिहास से जुड़ा और सोचने पर मजबूर करने वाला देखना चाहते हैं तो यह फिल्म एक सही चॉइस है।
डायरेक्शन: आशीष मॉल
प्रोड्यूसर: वीर कपूर
प्रोडक्शन स्टूडियो: कृधान मीडियाटेक
कॉन्सेप्ट: अनिल धनपत अग्रवाल
को-प्रोड्यूसर: आशीष तिवारी
एसोसिएट प्रोड्यूसर: अशोक प्रधान, मयंक पटेल, कबीर सदानंद
राइटर: नितिन सावंत, रोहित गहलोत, उत्सव दान
एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर: अभिनव शिव तिवारी
रेटिंग: 4/5 स्टार्स
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