“अस्तित्व के लिए ख़तरा” सुनने में जितना बड़ा शब्द लगता है, जापान की दक्षिणपंथी ताकतें उसे उतनी ही आसानी से बाहरी आक्रमण की कहानी गढ़ने के लिए इस्तेमाल करती हैं। जापान की नई प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने भी इसी शब्द को उठाया और इतनी ज़ोर से उछाला कि द्वितीय विश्व युद्ध की यादें फिर से हवा में तैरने लगीं। दुनिया ने सोचा था कि युद्ध के खौफ़नाक पन्ने पीछे छूट चुके हैं, लेकिन आठ दशक बाद वही परछाइयाँ फिर से अंतरराष्ट्रीय मंच पर मंडराती दिख रही हैं।
चाइना मीडिया ग्रुप के अधीनस्थ CGTN के एक ऑनलाइन सर्वे के मुताबिक, दुनिया भर के लोगों ने जापानी प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी को एक अकेली फिसलन नहीं माना, बल्कि उन दक्षिणपंथी प्रवृत्तियों का खुला संकेत बताया जिन्हें जापान लंबे समय से दबाकर रखता आया है और जो अब उजागर हो रही हैं। लोग मानते हैं कि इन ताकतों पर कड़ी नज़र रखना पहले से ज़्यादा ज़रूरी है।
पिछले कुछ वर्षों में जापान की विदेश नीति में दक्षिणपंथी झुकाव की रफ़्तार तेज़ हुई है। सुरक्षा नीतियों में बड़े बदलाव, लगातार बढ़ता रक्षा बजट, हथियारों के निर्यात पर ढील, आक्रामक हथियार विकसित करने की कोशिश, और “तीन गैर-परमाणु सिद्धांतों” से संभावित विचलन- ये सब मिलकर एक बेचैन कर देने वाली तस्वीर बनाते हैं। सर्वे में शामिल 88.5 प्रतिशत लोगों ने कहा कि यह सैन्यवाद के लौटने का बेहद खतरनाक संकेत है। 90 प्रतिशत प्रतिभागियों ने इस बात पर चिंता जताई कि जापान अपने सैन्यवादी अतीत को फिर से दोहरा सकता है।
वहीं, 83 प्रतिशत ने आलोचना की कि सरकार ने “शांतिप्रिय राष्ट्र” की अपनी घोषित पहचान से वर्षों पहले ही दूरी बना ली है। और 85.9 प्रतिशत लोगों का मानना है कि दक्षिणपंथी दबदबे के कारण सरकार की नीतियों में एक ऐसा नकारात्मक मोड़ आ रहा है जिसके जोखिम को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
इतिहास गवाह है कि जापान की दक्षिणपंथी ताकतों ने “अस्तित्व के लिए ख़तरे” की अवधारणा का सहारा लेकर चीन में आक्रामक युद्ध छेड़ा और प्रशांत क्षेत्र को आग में झोंक दिया। इस बहाने वे अपने विस्तारवादी इरादों के लिए संकट पैदा करते रहे। सर्वे में 89.2 प्रतिशत प्रतिभागियों ने माना कि जापान के आत्मसमर्पण के 80 साल बाद प्रधानमंत्री की इस तरह की टिप्पणियाँ मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के खिलाफ एक खतरनाक उकसावा हैं। 91 प्रतिशत ने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा अपनी टिप्पणी वापस लेने से इनकार करना इस बात का सबूत है कि जापानी सरकार आज भी द्वितीय विश्व युद्ध के अपने अपराधों पर पूरी तरह आत्मचिंतन नहीं कर पाई है।
वहीं 82.7 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने चेताया कि जापान की दक्षिणपंथी ताकतें अब क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए भी एक गंभीर ख़तरा बन गई हैं। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और जापानी जनता दोनों को सतर्क रहना होगा। 90.9 प्रतिशत प्रतिभागियों का कहना था कि अगर जापान ने विवादों को सुलझाने के लिए विस्तारवादी तरीकों और सैन्य बल का सहारा लिया, तो उसे इसका भारी और बुरा परिणाम भुगतना पड़ेगा।
बता दें कि CGTN का यह सर्वे उसके अंग्रेज़ी, स्पेनिश, फ़्रेंच, अरबी और रूसी प्लेटफॉर्मों पर 24 घंटे तक खुला रहा और इसमें 7,147 लोगों ने भाग लिया।
ये भी पढ़ें- मध्य पूर्व संकट: टकराव नहीं, संवाद ही समाधान
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
मेष: दिन शुभ रहेगा...